भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 684
अ० २७]पञ्चम स्कन्ध६७५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शोणितौघवहा कुल्या कृता मांसातिकर्दमा।<br>केशशैवलिनी भग्नरथचक्रविराजिता॥ ६<br>छिन्नबाह्वादिमत्स्याढ्या शीर्षतुम्बीफलान्विता।<br>भयदा कातराणां वै सुराणां मोदवर्धिनी॥ ७उसने समरभूमिमें रक्तकी नदी बना डाली है, जिसमें मांस कीचड़की भाँति, मस्तकके केश सेवारके सदृश और टूटे हुए रथोंके पहिये भँवरके समान, सैनिकोंके कटे हाथ आदि मछलीके समान और सिर तुम्बीके फलके तुल्य प्रतीत हो रहे हैं। वह [रुधिर-नदी] कायरोंको भयभीत करनेवाली तथा देवताओंके हर्षको बढ़ानेवाली है॥ ६-७॥
कुलं रक्ष महाराज पातालं गच्छ सत्वरम्।<br>क्रुद्धा देवी क्षयं सद्यः करिष्यति न संशयः॥ ८हे महाराज! अब आप दैत्यकुलकी रक्षा कीजिये और शीघ्र पाताललोक चले जाइये; अन्यथा क्रोधमें भरी वह देवी आज ही [सभी दानवोंका] विनाश कर डालेगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ८॥
सिंहोऽपि भक्षयत्याजौ दानवान्दनुजेश्वर।<br>तथैव कालिका देवी हन्ति बाणैरनेकधा॥ ९<br>तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मरणाय मृषा मतिम्।<br>करोषि सहितो भ्रात्रा शुम्भेन कुपिताशयः॥ १०हे दानवेन्द्र! अम्बिकाका वाहन सिंह भी युद्धभूमिमें दानवोंको खाता जा रहा है और कालिकादेवी अपने बाणोंसे [दैत्य सैनिकोंका] अनेक तरहसे वध कर रही है। अतएव हे राजेन्द्र! आप भी कोपके वशीभूत होकर अपने भाई निशुम्भसहित मरनेका व्यर्थ विचार कर रहे हैं॥ ९-१०॥
किं करिष्यति नार्यैषा क्रूरा कुलविनाशिनी।<br>यस्या हेतोर्महाराज हन्तुमिच्छसि बान्धवान्॥ ११हे महाराज! राक्षसकुलका नाश करनेवाली यह क्रूर स्त्री, जिसके लिये आप अपने बन्धुओंको मरवा डालना चाहते हैं, यदि आपको प्राप्त हो ही गयी तो यह आपको क्या सुख प्रदान करेगी?॥ ११॥
दैवाधीनौ महाराज लोके जयपराजयौ।<br>अल्पार्थाय महद्दुःखं बुद्धिमान्न प्रकल्पयेत्॥ १२हे महाराज! जगत्में जय तथा पराजय दैवके अधीन होती है। बुद्धिमान्‌को चाहिये कि अल्प प्रयोजनके लिये भारी कष्ट न उठाये॥ १२॥
चित्रं पश्य विधेः कर्म यदधीनं जगत् प्रभो।<br>निहता राक्षसाः सर्वे स्त्रिया पश्यैकयानया॥ १३हे प्रभो! जिसके अधीन यह सारा जगत् रहता है, उस विधाताका अद्भुत कर्म देखिये कि इस स्त्रीने अकेले ही सम्पूर्ण राक्षसोंका संहार कर डाला॥ १३॥
जेता त्वं लोकपालानां सैन्ययुक्तो हि साम्प्रतम्।<br>एका प्रार्थयते बाला युद्धायेति सुसम्भ्रमः॥ १४आप लोकपालोंको जीत चुके हैं और इस समय आपके पास बहुत-से सैनिक भी हैं तथापि एक स्त्री युद्धके लिये आपको ललकार रही है; यह महान् आश्चर्य है!॥ १४॥
पुरा त्वया तपस्तप्तं पुष्करे देवतायने।<br>वरदानाय सम्प्राप्तो ब्रह्मा लोकपितामहः॥ १५<br>धात्रोक्तस्त्वं महाराज वरं वरय सुव्रत।<br>तदा त्वयामृत्वं च प्रार्थितं ब्रह्मणः किल॥ १६पूर्वकालमें आपने पुष्कर तीर्थमें एक देवालयमें तप किया था। उस समय वर प्रदान करनेके लिये लोकपितामह ब्रह्माजी आपके पास आये थे। हे महाराज! जब ब्रह्माजीने आपसे कहा—‘हे सुव्रत! वर माँगो’ तब आपने ब्रह्माजीसे अमर होनेकी यह

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—22 C