भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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६८०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २८
लोभे क्रोधे च दुर्धर्षे मोहे मतिविनाशके।<br>तस्मात्त्वमपि कल्याणि कुरु कान्तं मनोहरम्॥ ६२<br>शुम्भं सुराणां जेतारं निशुम्भं वा महाबलम्।कहाँ ज्ञान रह जाता है और कहाँ वैराग्य! अतएव हे कल्याणि! तुम भी देवताओंपर विजय प्राप्त कर लेनेवाले मनोहर तथा महाबली शुम्भ अथवा निशुम्भको पति बना लो॥ ५९—६२ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा रक्तबीजोऽसौ विरराम पुरःस्थितः।<br>श्रुत्वा जहास चामुण्डा कालिका चाम्बिका तथा॥ ६३व्यासजी बोले— इतना कहकर वह रक्तबीज देवीके सामने चुपचाप खड़ा हो गया। उसकी बातें सुनकर चामुण्डा, कालिका और अम्बिका हँसने लगीं॥ ६३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे रक्तबीजद्वारा देवीसमीपे शुम्भनिशुम्भसंवादवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥


अथाष्टाविंशोऽध्यायः

देवीके साथ रक्तबीजका युद्ध, विभिन्न शक्तियोंके साथ भगवान् शिवका रणस्थलमें आना तथा भगवतीका उन्हें दूत बनाकर शुम्भके पास भेजना, भगवान् शिवके सन्देशसे दानवोंका क्रुद्ध होकर युद्धके लिये आना

व्यास उवाच<br>कृत्वा हास्यं ततो देवी तमुवाच विशांपते।<br>मेघगम्भीरया वाचा युक्तियुक्तमिदं वचः॥ १<br><br>पूर्वमेव मया प्रोक्तं मन्दात्मन् किं विकत्थसे।<br>दूतस्याग्रे यथायोग्यं वचनं हितसंयुतम्॥ २<br><br>सदृशो मम रूपेण बलेन विभवेन च।<br>त्रिलोक्यां यदि कोऽपि स्यात्तं पतिं प्रवृणोम्यहम्॥ ३<br><br>ब्रूहि शुम्भं निशुम्भञ्च प्रतिज्ञा मे पुरा कृता।<br>तस्माद्युध्यस्व जित्वा मां विवाहं विधिवत्कुरु॥ ४व्यासजी बोले— हे राजन्! तत्पश्चात् वे देवी हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें उस रक्तबीजसे यह युक्तिसंगत वचन बोलीं— हे मन्दबुद्धि! तुम क्यों व्यर्थ प्रलाप कर रहे हो? मैं तो पहले ही दूतके सामने उचित और हितकर बात कह चुकी हूँ कि यदि तीनों लोकोंमें कोई भी पुरुष रूप, बल और वैभवमें मेरे समान हो तो मैं पतिरूपमें उसका वरण कर लूँगी। अब तुम शुम्भ-निशुम्भसे कह दो कि मैं पूर्वकालमें ऐसी प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ, अतः मेरे साथ युद्ध करो और रणमें मुझे जीतकर [मेरे साथ] विधिवत् विवाह कर लो॥ १—४॥
त्वं वै तदाज्ञया प्राप्तस्तस्य कार्यार्थसिद्धये।<br>संग्रामं कुरु पातालं गच्छ वा पतिना सह॥ ५तुम भी शुम्भकी आज्ञासे उसका कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँ आये हो। अतएव यदि चाहो तो मेरे साथ युद्ध करो अथवा अपने स्वामीके साथ पाताललोक चले जाओ॥ ५॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्याः स दैत्योऽमर्षपूरितः।<br>मुमोच तरसा बाणान्सिंहस्योपरि दारुणान्॥ ६व्यासजी बोले— देवीकी बात सुनकर वह दैत्य क्रोधमें भर उठा और बड़े वेगसे देवीके सिंहपर भीषण बाण छोड़ने लगा॥ ६॥
अम्बिका ताञ्छरान्वीक्ष्य गगने पन्नगोपमान्।<br>चिच्छेद सायकैस्तीक्ष्णैर्लघुहस्ततया क्षणात्॥ ७सर्पसदृश उन बाणोंको देखकर अम्बिकाने दक्षतापूर्वक बड़ी फुर्तीके साथ अपने तीखे बाणोंसे उन्हें आकाशमें ही क्षणभरमें काट डाला॥ ७॥