भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 699, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 699

६९० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २९

संस्कृत श्लोकहिन्दी टीका
जित्वा सर्वान्सुरानाजौ कृत्वा राज्यं सुपुष्कलम्।<br>कथं नारीभयोद्विग्नः पातालं प्रविशाम्यहम्॥ ५०<br>निहत्य पार्षदान्सर्वान् रक्तबीजमुखान् रणे।<br>प्राणत्राणाय गच्छामि हित्वा किं विपुलं यशः॥ ५१रणभूमिमें सभी देवताओंको जीतकर तथा विशाल राज्यका भोग करके भला एक स्त्रीके भयसे व्याकुल होकर मैं पाताल क्यों चला जाऊँ? रक्तबीज आदि प्रमुख पार्षदोंको रणमें मरवाकर और अपनी विशद कीर्तिका नाश करके प्राणरक्षाके लिये मैं पाताल क्यों चला जाऊँ?॥ ५०-५१॥
मरणं त्वनिवार्यं वै प्राणिनां कालकल्पितम्।<br>तद्भयं जन्मनोपात्तं त्यजेत्को दुर्लभं यशः॥ ५२कालके द्वारा निर्धारित प्राणियोंकी मृत्यु तो अनिवार्य है। जन्मके साथ ही मृत्युका भय प्राणीके साथ लग जाता है। तब भला कौन (बुद्धिमान्) व्यक्ति दुर्लभ यशका त्याग कर सकता है?॥ ५२॥
निशुम्भाहं गमिष्यामि रथारूढो रणाजिरे।<br>हत्वा तामागमिष्यामि नागमिष्यामि चान्यथा॥ ५३हे निशुम्भ! मैं रथपर सवार होकर युद्धभूमिमें जाऊँगा और उसे मारकर ही वापस आऊँगा और यदि मैं उसे मार न सका तो फिर वापस नहीं लौटूँगा॥ ५३॥
त्वं तु सेनायुतो वीर पार्ष्णिग्राहो भवस्व मे।<br>तरसा तां शरैस्तीक्ष्णैर्नारीं नय यमालये॥ ५४हे वीर! तुम भी सेना साथमें लेकर चलो और युद्धमें मेरे सहायक बनो। वहाँ अपने तीक्ष्ण बाणोंसे मारकर तुम उस स्त्रीको शीघ्र ही यमलोक पहुँचा दो॥ ५४॥
निशुम्भ उवाच<br>अहमद्य हनिष्यामि गत्वा दुष्टाञ्च कालिकाम्।<br>आगमिष्याम्यहं शीघ्रं गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्॥ ५५निशुम्भ बोला—मैं अभी युद्धक्षेत्रमें जाकर दुष्ट कालिकाको मार डालूँगा और उस अम्बिकाको लेकर शीघ्र ही आपके पास आ जाऊँगा॥ ५५॥
मा चिन्तां कुरु राजेन्द्र वराकायास्तु कारणे।<br>क्वौषा बाला क्व मे बाहुवीर्यं विश्ववशङ्करम्॥ ५६<br>त्यक्त्वार्त्तिं विपुलां भ्रातृर्भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान्।<br>आनयिष्याम्यहं कामं मानिनीं मानसयुताम्॥ ५७हे राजेन्द्र! आप उस बेचारीके विषयमें चिन्ता मत कीजिये। कहाँ यह एक साधारण स्त्री और कहाँ पूरे विश्वको अपने वशमें कर लेनेवाला मेरा बाहुबल! हे भाई! आप इस भारी चिन्ताको छोड़कर सर्वोत्तम सुखोंका उपभोग कीजिये। मैं आदरकी पात्र उस मानिनीको अवश्य ही ले आऊँगा॥ ५६-५७॥
मयि तिष्ठति ते राजन्न युक्तं गमनं रणे।<br>गत्वाहमानयिष्यामि तवार्थे वै जयश्रियम्॥ ५८हे राजन्! मेरे रहते युद्धक्षेत्रमें आपका जाना उचित नहीं है। आपका कार्य सिद्ध करनेके लिये मैं वहाँ जाकर विजयश्री अवश्य ही प्राप्त करूँगा॥ ५८॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा भ्रातरं ज्येष्ठं कनीयान्बलगर्वितः।<br>रथमास्थाय विपुलं सन्नद्धः स्वबलावृतः॥ ५९व्यासजी बोले—बड़े भाई शुम्भसे ऐसा कहकर अपने बलपर अभिमान रखनेवाले छोटे भाई निशुम्भने कवच धारण कर लिया और अपनी सेना साथमें लेकर एक विशाल रथपर आरूढ़ हो स्वयं अनेकविध