भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 713

| ७०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३२ | | :--- | :--- |

| सूत उवाच<br>इति भूपवचः श्रुत्वा प्रीतः सत्यवतीसुतः।<br>प्रत्युवाच नृपं कृष्णो महामायाप्रपूजनम्॥ ४ | सूतजी बोले— राजाकी यह बात सुनकर सत्यवतीनन्दन कृष्णद्वैपायन प्रसन्न होकर उन्हें महामाया भगवतीका पूजन-विधान बताने लगे॥ ४॥ | | व्यास उवाच<br>स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं सुरथो नाम पार्थिवः।<br>बभूव परमोदारः प्रजापालनतत्परः॥ ५<br>सत्यवादी कर्मपरो ब्राह्मणानाञ्च पूजकः।<br>गुरुभक्तिरतो नित्यं स्वदारगमने रतः॥ ६<br>दानशीलोऽविरोधी च धनुर्वेदैकपारगः। | व्यासजी बोले— पूर्वकालमें स्वारोचिष-मन्वन्तरमें सुरथ नामक एक राजा हुए; जो परम उदार, प्रजापालनमें तत्पर, सत्यवादी, कर्मनिष्ठ, ब्राह्मणोंके उपासक, गुरुजनोंके प्रति भक्ति रखनेवाले, सदा अपनी ही भार्यामें अनुरक्त, दानशील, किसीके साथ विरोधभाव न रखनेवाले तथा धनुर्विद्यामें पूर्ण पारंगत थे॥ ५-६ १/२ ॥ | | एवं पालयतो राज्यं म्लेच्छाः पर्वतवासिनः॥ ७<br>बलाच्छत्रुत्वमापन्नाः सैन्यं कृत्वा चतुर्विधम्।<br>हस्त्यश्वरथपादातिसहितास्ते मदोत्कटाः॥ ८<br>कोलाविध्वंसिनः प्राप्ताः पृथ्वीग्रहणतत्पराः।<br>सुरथः सैन्यमादाय सम्मुखः समपद्यत॥ ९<br>युद्धं समभवद् घोरं तस्य तैरतिदारुणैः। | इस प्रकार प्रजापालनमें तत्पर रहनेवाले राजा सुरथसे कुछ पर्वतवासी म्लेच्छोंने अनायास ही शत्रुता ठान ली। हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकोंसे सुसज्जित चतुरङ्गिणी सेना लेकर अभिमानमें चूर वे कोलाविध्वंसी सुरथके राज्यपर अधिकार करनेकी लालसासे वहाँ आ पहुँचे। सुरथ भी अपनी सेना लेकर सामने डट गये। उन महाभयंकर म्लेच्छोंके साथ राजा सुरथका भीषण युद्ध होने लगा॥ ७-९ १/२ ॥ | | म्लेच्छानां तु बलं स्वल्पं राजंस्तद्बलमद्भुतम्॥ १०<br>तथापि तैर्जितो युद्धे दैवाद्राजा पराजितः।<br>भग्नश्च स्वपुरं प्राप्तः सुरक्षं दुर्गमण्डितम्॥ ११ | यद्यपि म्लेच्छोंकी सेना बहुत थोड़ी थी तथा राजाकी सेना अत्यन्त विशाल थी, फिर भी दैवयोगसे उन्होंने राजा सुरथको युद्धमें जीत लिया। इस प्रकार उनसे पराजित हुए राजा सुरथ हताश होकर अपने दुर्गवेष्टित सुरक्षित नगरमें आ गये॥ १०-११॥ | | चिन्तयामास मेधावी राजा नीतिविचक्षणः।<br>प्रधानान्विमना दृष्ट्वा शत्रुपक्षसमाश्रितान्॥ १२<br>स्थानं गृहीत्वा विपुलं परिखादुर्गमण्डितम्।<br>कालप्रतीक्षा कर्तव्या किं वा युद्धं वरं मतम्॥ १३<br>मन्त्रिणः शत्रुवशगा मन्त्रयोग्या न ते किल।<br>किं करोमीति मनसा भूपतिः समचिन्तयत्॥ १४<br>कदाचित्ते गृहीत्वा मां पापाचाराः पराश्रिताः।<br>शत्रुभ्योऽथ प्रदास्यन्ति तदा किं वा भविष्यति॥ १५<br>पापबुद्धिषु विश्वासो न कर्तव्यः कदाचन।<br>किन्न ते वै प्रकुर्वन्ति ये लोभवशगा नराः॥ १६<br>भ्रातरं पितरं मित्रं सुहृदं बान्धवं तथा। | पश्चात् प्रतिभासम्पन्न तथा नीतिविशारद राजा सुरथ अपने मन्त्रियोंको शत्रुपक्षके अधीन देखकर अत्यन्त खिन्नमनस्क होकर विचार करने लगे कि मैं खाई तथा किलेसे सुरक्षित किसी बड़े स्थानपर रहकर समयकी प्रतीक्षा करूँ अथवा मेरे लिये युद्ध करना उचित होगा। मेरे मन्त्री शत्रुके वशीभूत हो गये हैं, इसलिये वे अब परामर्श करनेयोग्य नहीं रह गये हैं, तो अब मैं क्या करूँ? वे राजा सुरथ पुनः मन-ही-मन विचार करने लगे। कदाचित् वे पापी तथा शत्रुके साथ मिले हुए मन्त्री मुझे पकड़कर शत्रुओंको सौंप देंगे, तब क्या होगा? पापबुद्धि पुरुषोंपर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जो मनुष्य लोभके वशीभूत होते हैं वे क्या-क्या नहीं कर बैठते? लोभपरायण मनुष्य अपने भाई, पिता, मित्र, सुहृद्, |