देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 723, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३४ |
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| कल्पिताः स्वस्वकार्येषु प्रेरिता लीलया त्वमी।<br>स्वांशं तेषु समारोप्य कृतास्ते बलवत्तराः॥ ६३<br><br>दत्ताश्च शक्तयस्तेभ्यो गीर्लक्ष्मीर्गिरिजा तथा।<br>ते तां ध्यायन्ति देवेशाः पूजयन्ति परां मुदा॥ ६४ | उनकी रचना करती हैं और उन्हें अपने-अपने कार्यों (जगत्का सृजन, पालन और संहार)—में प्रवृत्त करती हैं। वे (देवी) उनमें अपने अंश (शक्ति)—का आरोपणकर उन्हें बलवान् बनाती हैं। उन्होंने सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वतीके रूपमें उन्हें अपनी शक्तियाँ दी हैं। अतः वे त्रिदेव उन्हीं पराम्बाको सृजन, पालन और संहार करनेवाली जानकर प्रसन्नतापूर्वक उनका ध्यान और पूजन करते हैं॥ ६०–६४१/२॥ | | ज्ञात्वा सर्वेश्वरीं शक्तिं सृष्टिस्थितिविनाशिनीम्।<br>एतत्ते सर्वमाख्यातं देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>मम बुद्धयनुसारेण नान्तं जानामि भूपते॥ ६५ | हे राजन्! इस प्रकार मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार देवीका यह उत्तम माहात्म्य आपसे कह दिया, मैं इसका अन्त नहीं जानता हूँ॥ ६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥
अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
मुनि सुमेधाद्वारा देवीकी पूजा-विधिका वर्णन
| राजोवाच | राजा बोले— |
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| भगवन्ब्रूहि मे सम्यक्तस्या आराधने विधिम्।<br>पूजाविधिञ्च मन्त्रांश्च तथा होमविधिं वद॥ १ | हे भगवन्! अब मुझे उन देवीकी आराधना-विधि भलीभाँति बताइये; साथ ही पूजा-विधि, हवनकी विधि और मन्त्र भी बताइये॥ १॥ |
| ऋषिरुवाच | ऋषि बोले— |
| शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तस्याः पूजाविधिं शुभम्।<br>कामदं मोक्षदं नृणां ज्ञानदं दुःखनाशनम्॥ २ | हे राजन्! सुनिये, मैं उनके पूजनकी शुभ विधि बताता हूँ, जो मनुष्योंको काम, मोक्ष और ज्ञानको देनेवाली तथा उनके दुःखोंका नाश करनेवाली है॥ २॥ |
| आदौ स्नानविधिं कृत्वा शुचिः शुक्लाम्बरो नरः।<br>आचम्य प्रयततः कृत्वा शुभमायतनं निजम्॥ ३<br><br>ततोऽवलिप्तभूम्यां तु संस्थाप्यासन्नमुत्तमम्।<br>तत्रोपविश्य विधिवत् त्रिराचम्य मुदान्वितः॥ ४<br><br>पूजाद्रव्यं सुसंस्थाप्य यथाशक्त्यनुसारतः।<br>प्राणायामं ततः कृत्वा भूतशुद्धिं विधाय च॥ ५<br><br>कुर्यात्प्राणप्रतिष्ठां तु सम्भारं प्रोक्ष्य मन्त्रतः।<br>कालज्ञानं ततः कृत्वा न्यासं कुर्याद्यथाविधि॥ ६ | मनुष्यको सर्वप्रथम विधिपूर्वक स्नान करके पवित्र हो श्वेत वस्त्र धारण कर लेना चाहिये। तत्पश्चात् वह सावधानीपूर्वक आचमन करके पूजा-स्थानको शुद्ध करनेके बाद लिपी हुई भूमिपर उत्तम आसन बिछाकर उसपर बैठ जाय और प्रसन्न होकर विधिपूर्वक तीन बार आचमन करे। अपनी शक्तिके अनुसार पूजाद्रव्यको सुव्यवस्थित ढंगसे रखकर प्राणायाम कर ले, उसके बाद भूतशुद्धि करके और पुनः मन्त्र पढ़कर समस्त पूजन-सामग्रीका प्रोक्षण करके देवीमूर्तिकी प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिये। तत्पश्चात् देशकालका उच्चारणकर विधिपूर्वक न्यास करना चाहिये॥ ३—६॥ |