भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 730
अ० ३५ ]पञ्चम स्कन्ध७२१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कृत्वा राज्यं सुविपुलं वर्षाणामयुतं नृप।<br>देहान्ते जन्म सम्प्राप्य सूर्याच्च भविता मनुः॥ ३६साम्राज्यका दस हजार वर्षोंतक शासन करके देहत्यागके बाद सूर्यसे जन्म प्राप्त करके तुम [सावर्णि] मनु होओगे॥ ३४—३६॥
व्यास उवाच<br>वैश्यस्तामप्युवाचेदं कृताञ्जलिपुटः शुचिः।<br>न मे गृहेण कार्यं वै न पुत्रेण धनेन वा॥ ३७<br>सर्वं बन्धकरं मातः स्वप्नवन्नश्वरं स्फुटम्।<br>ज्ञानं मे देहि विशदं मोक्षदं बन्धनाशनम्॥ ३८<br>असारेऽस्मिंश्च संसारे मूढा मज्जन्ति पामराः।<br>पण्डिताः सन्तरन्तीह तस्मान्नेच्छन्ति संसृतिम्॥ ३९**व्यासजी बोले—**शुद्धहृदय वैश्यने हाथ जोड़कर कहा—अब मुझे न घरकी आवश्यकता है, न धनकी और न पुत्रकी ही। हे माता! ये सभी बन्धनमें डालनेवाले और स्वप्नकी भाँति नश्वर हैं, अतः आप मुझे बन्धनका नाश करनेवाला और मोक्ष देनेवाला दिव्य ज्ञान प्रदान करें। इस असार संसारमें अज्ञानी डूब जाते हैं और ज्ञानी पार उतर जाते हैं, इसलिये वे संसारकी इच्छा नहीं करते॥ ३७—३९॥
व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य महामाया वैश्यं प्राह पुरःस्थितम्।<br>वैश्यवर्य तव ज्ञानं भविष्यति न संशयः॥ ४०**व्यासजी बोले—**तब अपने समक्ष खड़े वैश्यकी बात सुनकर देवी महामायाने कहा—हे वैश्यश्रेष्ठ! तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा, इसमें सन्देह नहीं है॥ ४०॥
इति दत्त्वा वरं ताभ्यां तत्रैवान्तरधीयत।<br>अदर्शनं गतायां तु राजा तं मुनिसत्तमम्॥ ४१<br>प्रणम्य हयमारुह्य गमनाय मनो दधे।<br>तदैव तस्य सचिवास्तत्रागत्य नृपं प्रजाः॥ ४२<br>प्रणेमुर्विनयोपेतास्तमूचुः प्राञ्जलिस्थिताः।<br>राजंस्ते शत्रवः सर्वे पापाच्च निहता रणे॥ ४३<br>राज्यं निष्कण्टकं भूप कुरुष्व पुरमास्थितः।इस प्रकार उन दोनोंको वरदान देकर देवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। तब भगवतीके अन्तर्धान हो जानेपर राजा सुरथने उन मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके घोड़ेपर चढ़कर चलनेका निश्चय किया, तभी उनके प्रजाजनों और मन्त्रिगणोंने वहाँ आकर प्रणाम किया; वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये तथा विनम्र होकर राजासे कहने लगे—हे राजन्! आपके शत्रुगण अपने पापके कारण युद्धमें मारे गये। हे भूप! अब आप अपने नगरमें निवास करके निष्कण्टक राज्य कीजिये॥ ४१—४३ \frac{१}{२}॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राजा नत्वा तं मुनिसत्तमम्॥ ४४<br>आपृच्छ्य निर्ययौ तत्र मन्त्रिभिः परिवारितः।<br>सम्प्राप्य च निजं राज्यं दारान्स्वजनबान्धवान्॥ ४५<br>बुभुजे पृथिवीं सर्वां ततः सागरमेखलाम्।उनकी बात सुनकर राजा मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके उनसे आज्ञा लेकर मन्त्रियोंके साथ चल दिये। वे अपने राज्य, स्त्री और बन्धु-बान्धवोंको पाकर समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य भोगने लगे॥ ४४—४५ \frac{१}{२}॥
वैश्योऽपि ज्ञानमासाद्य मुक्तसङ्गः समन्ततः॥ ४६<br>कालातिवाहनं तत्र मुक्तबन्धश्चकार ह।<br>तीर्थेषु विचरन्गायन्भगवत्या गुणानथ॥ ४७वैश्य भी ज्ञान प्राप्त करके सर्वथा आसक्तिरहित और बन्धनसे मुक्त होकर तीर्थोंमें भ्रमण करता हुआ तथा भगवतीके गुणोंका गान करता हुआ समय व्यतीत करने लगा॥ ४६—४७॥
एतत्ते कथितं देव्याश्चरितं परमाद्भुतम्।<br>आराधनफलप्राप्तिस्तथाऽभून्नृपवैश्ययोः ॥ ४८<br>दैत्यानां हननं प्रोक्तं प्रादुर्भावस्तथा शुभः।<br>एवंप्रभावा सा देवी भक्तानामभयप्रदा॥ ४९इस प्रकार देवीकी परम अद्भुत लीला तथा राजा और वैश्यद्वारा की गयी उनकी आराधना एवं फलप्राप्तिको मैंने यथार्थ रूपसे आपसे कहा। देवीके शुभ आविर्भाव और उनके द्वारा दैत्योंके विनाशकी कथा भी मैंने आपसे कही। भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाली वे भगवती ऐसे प्रभाववाली हैं!॥ ४८—४९॥