देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
षष्ठः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
त्रिशिराकी तपस्यासे चिन्तित इन्द्रद्वारा तपभंगहेतु अप्सराओंको भेजना
| ऋषय ऊचुः<br>सूत सूत महाभाग मिष्टं ते वचनामृतम्।<br>न तृप्ताः स्मो वयं पीत्वा द्वैपायनकृतं शुभम्॥ १<br><br>पुनस्त्वां प्रष्टुमिच्छामः कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>वेदेऽपि कथितां रम्यां प्रसिद्धां पापनाशिनीम्॥ २ | ऋषिगण बोले—हे महाभाग सूतजी! आपकी वाणीरूपी अत्यन्त मधुर सुधाका पान करके अभी हम सन्तुप्त नहीं हुए हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यासजीने जिस उत्तम श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणका प्रणयन किया है; उस पुराणकी मंगलमयी, वेदवर्णित, मनोहर, प्रसिद्ध और पापोंका नाश करनेवाली कथाको हम आपसे पुनः पूछना चाहते हैं॥ १-२॥ |
|---|---|
| वृत्रासुर इति ख्यातो वीर्यवांस्त्वष्टुरात्मजः।<br>स कथं निहतः संख्ये वासवेन महात्मना॥ ३<br><br>त्वष्टा वै सुरपक्षीयस्तत्पुत्रो बलवत्तरः।<br>शक्रेण घातितः कस्माद् ब्रह्मयोनिर्महाबलः॥ ४<br><br>देवाः सत्त्वगुणोत्पन्ना मानुषा राजसाः स्मृताः।<br>तिर्यञ्चस्तामसाः प्रोक्ताः पुराणागमवादिभिः॥ ५<br><br>विरोधोऽत्र महान् भाति नूनं शतमखेन ह।<br>छलेन बलवान् वृत्रः शक्रेण विनिपातितः॥ ६<br><br>विष्णुः प्रेरयिता तत्र स तु सत्त्वधरः परः।<br>प्रविष्टः पविमध्ये स छद्मना भगवान् प्रभुः॥ ७<br><br>सन्धिं विधाय स ह्येवं मन्त्रितोऽसौ महाबलः।<br>हरिभ्यां सत्यमुत्सृज्य जलफेनेन शातितः॥ ८ | त्वष्टाका वृत्रासुर नामसे विख्यात पराक्रमी पुत्र महात्मा इन्द्रके द्वारा क्यों मारा गया? त्वष्टा तो देवपक्षके थे और उनका पुत्र अत्यन्त बलवान् था, ब्राह्मणवंशमें उत्पन्न उस महाबलीका इन्द्रके द्वारा क्यों वध किया गया? पुराणों और शास्त्रोंके तत्त्वज्ञलोगोंने देवताओंको सत्त्वगुणसे, मनुष्योंको रजोगुणसे और पशु-पक्षी आदि तिर्यक् योनियोंको तमोगुणसे उत्पन्न कहा है, परंतु यहाँ तो महान् विरोध प्रतीत होता है कि बलवान् वृत्रासुर सौ यज्ञोंके कर्ता इन्द्रके द्वारा छलपूर्वक मारा गया और इसके लिये भगवान् विष्णुद्वारा प्रेरणा दी गयी जो कि स्वयं महान् सत्त्वगुणी हैं तथा वे परम प्रभु छलपूर्वक वज्रमें प्रविष्ट हुए! सन्धि करके उस महाबली वृत्रको पहले आश्वस्त कर दिया गया, किंतु पुनः विष्णु और इन्द्रने सत्य (सन्धिकी बात)-को छोड़कर जलके फेनसे उसे मार डाला!॥ ३–८॥ |
| कृतमिन्द्रेण हरिणा किमेतत्सत साहसम्।<br>महान्तोऽपि च मोहेन वञ्चिताः पापबुद्धयः॥ ९ | हे सूतजी! इन्द्र और विष्णुके द्वारा ऐसा दुःसाहस क्यों किया गया? महान् लोग भी मोहमें फँसकर पापबुद्धि हो जाते हैं॥ ९॥ |