देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 738, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 738
| अ० २ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इति विचिन्त्य पविं परमायुधं<br>प्रति मुमोच मुनिं तपसि स्थितम्।<br>शशिदिवाकरसन्निभमाशुगं<br>त्रिशिरसं सुरसङ्घपतिः स्वयम्॥ ४ | स्वामी इन्द्रने अपने तीव्रगामी तथा श्रेष्ठ आयुध वज्रको सूर्य-चन्द्रमाके समान तेजस्वी, तपमें स्थित मुनि त्रिशिराके ऊपर चला दिया॥ ३-४॥ |
| तदभिघातहतः स धरातले<br>किल पपात ममार च तापसः।<br>शिखरिणः शिखरं कुलिशार्दितं<br>निपतितं भुवि चाद्भुतदर्शनम्॥ ५ | उसके प्रहारसे घायल होकर वे तपस्वी उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़े और निष्प्राण हो गये, जैसे वज्रसे विदीर्ण होकर पर्वतोंके शिखर पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं; यह घटना देखनेमें बड़ी अद्भुत थी॥ ५॥ |
| तं निहत्य मुदमाप सुरेश-<br>श्चुक्रुशुश्च मुनयस्तु संस्थिताः।<br>हा हतेति भृशमार्तनिस्वनाः<br>किं कृतं शतमखेन पापिना॥ ६ | उनको मारकर इन्द्र प्रसन्न हो गये, परंतु वहाँ स्थित अन्य मुनिगण आर्तस्वरमें चिल्लाने लगे कि हाय! हाय! सौ यज्ञ करनेवाले पापी इन्द्रने यह क्या कर डाला!॥ ६॥ |
| विनापराधं तपसां निधिर्हतः<br>शचीपतिः पापमतिर्दुरात्मा।<br>फलं किलायं तरसा कृतस्य<br>प्राप्नोतु पापी हननोद्भवस्य॥ ७ | पापबुद्धि और दुष्टात्मा शचीपति इन्द्रने इस निरपराध तपोनिधिको मार डाला। इस हत्याजनित पापका फल यह पापी अब शीघ्र ही प्राप्त करे॥ ७॥ |
| तं निहत्य तरसा सुरराजो<br>निजगाम निजमन्दिरमाशु।<br>स हतोऽपि विरराज महात्मा<br>जीवमान इव तेजसां निधिः॥ ८ | उन्हें मारकर देवराज तुरंत ही अपने भवनको जानेके लिये उद्यत हुए। तेजके निधि वे महात्मा (त्रिशिरा) मर जानेपर भी जीवितकी भाँति प्रतीत होते थे॥ ८॥ |
| तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ जीवन्तमिव वृत्रहा।<br>चिन्तामापातिखिन्नाङ्गः किं वा जीवेदयं पुनः॥ ९ | उसे जीवितकी भाँति भूमिपर गिरा हुआ देखकर अति उदास मनवाले वे वृत्रहन्ता इन्द्र इस चिन्तामें पड़ गये कि कहीं यह फिर जीवित न हो जाय॥ ९॥ |
| विमृश्य मनसातीव तक्षाणं पुरतः स्थितम्।<br>मघवा वीक्ष्य तं प्राह स्वकार्यसदृशं वचः॥ १० | मनमें बहुत देरतक विचार करनेके बाद इन्द्रने सामने खड़े तक्षा (बढ़ई)-को देखकर अपने कार्यके अनुरूप बात कही॥ १०॥ |
| तक्षंश्छिन्धि शिरांस्यस्य कुरुष्व वचनं मम।<br>मा जीवतु महातेजा भाति जीवन्निव स्वयम्॥ ११<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य तक्षोवाच विगर्हयन्। | हे तक्षन्! मेरा कहा हुआ करो; इसके सिर काट लो, जिससे यह जीवित न रहे। यह महातेजस्वी जीवित न होते हुए भी जीवितकी भाँति प्रतीत होता है। उनकी यह बात सुनकर तक्षाने धिक्कारते हुए कहा—॥ ११ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>महास्कन्धो भृशं भाति परशुर्न तरिष्यति॥ १२<br>ततो नाहं करिष्यामि कार्यमेतद्विगर्हितम्।<br>त्वया वै निन्दितं कर्म कृतं सद्भिर्विगर्हितम्॥ १३<br>अहं बिभेमि पापाद्वै मृतस्यैव च मारणे।<br>मृतोऽयं मुनिरस्त्येव शिरसः कृन्तनेन किम्॥ १४<br>भयं किं तेऽत्र सञ्जातं पाकशासन कथ्यताम्। | तक्षा बोला— ये अति विशाल कन्धेवाले प्रतीत हो रहे हैं। मेरा परशु इस कन्धेको काट नहीं सकेगा। अतः मैं इस निन्दनीय कार्यको नहीं करूँगा, आपने तो निन्दित और सत्पुरुषोंद्वारा गर्हित कर्म कर डाला है, मैं पापसे डरता हूँ; फिर मरे हुएको क्यों मारूँ? ये मुनि तो मर गये हैं, फिर इनका सिर काटनेसे क्या प्रयोजन? हे पाकशासन! कहिये, इनसे आपको क्या भय उत्पन्न हुआ है?॥ १२-१४ १/२॥ |