देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 744, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 744
| अ० ३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आज्ञापयामास तदा सेनोद्योगाय सेवकान्।<br>आनयध्वं वसून् रुद्रानश्विनौ च दिवाकरान् ॥ ३०<br>पूषणं च भगं वायुं कुबेरं वरुणं यमम्।<br>विमानेषु समारुह्य सायुधाः सुरसत्तमाः ॥ ३१<br>समागच्छन्तु तरसा शत्रुरायाति साम्प्रतम्।<br>इत्याज्ञाप्य सुरपतिः समारुह्य गजोत्तमम् ॥ ३२ | तब उन्होंने सेवकोंको सेना तैयार करनेका आदेश दिया। 'वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों, आदित्यों, पूषा, भग, वायु, कुबेर, वरुण और यमको बुलाओ। सभी श्रेष्ठ देवता आयुधोंके साथ विमानोंपर आरूढ़ होकर यहाँ शीघ्र आ जायें; क्योंकि अब शत्रु आने ही वाला है'—ऐसी आज्ञा देकर देवराज अपने श्रेष्ठ गजराज ऐरावतपर सवार होकर बृहस्पतिको आगे करके अपने भवनसे बाहर निकले ॥ ३०—३२ १/२ ॥ |
| बृहस्पतिं पुरोधाय निर्गतो निजमन्दिरात्।<br>तथैव त्रिदशाः सर्वे स्वं स्वं वाहनमास्थिताः॥ ३३<br>युद्धाय कृतसंकल्पा निर्ययुः शस्त्रपाणयः।<br>वृत्रोऽथ दानवैर्युक्तः सम्प्राप्तो मानसोत्तरम् ॥ ३४<br>पर्वतं देवतावासं रम्यं पादपशोभितम्।<br>इन्द्रोऽप्यागत्य संग्रामं चकार मानसोत्तरे ॥ ३५ | वैसे ही अन्य सभी देवता भी हाथोंमें शस्त्र लेकर अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर युद्धका संकल्प करके चल पड़े। उधर वृत्रासुर भी विशाल दानवी सेनाके साथ वृक्षोंसे सुशोभित, रमणीय तथा देवताओंसे सेवित मानसरोवरके उत्तरवर्ती पर्वतपर आ गया। बृहस्पतिको आगे करके सभी देवताओंके साथ इन्द्रने भी उस मानसोत्तर पर्वतपर आकर संग्राम किया ॥ ३३—३५ १/२ ॥ |
| पर्वते देवतायुक्तो वाचस्पतिपुरःसरः।<br>तत्राभूद्दारुणं युद्धं वृत्रवासवयोस्तदा ॥ ३६<br>गदास परिघैः पाशैर्बाणैः शक्तिपरश्वधैः।<br>मानुषेण प्रमाणेन संग्रामः शरदां शतम् ॥ ३७ | तब गदा, तलवार, परिघ, पाश, बाण, शक्ति और परशु आदि युद्धास्त्रोंके द्वारा वृत्रासुर और इन्द्रमें भयानक युद्ध हुआ। मनुष्यों और विशुद्ध हृदयवाले ऋषियोंके लिये अत्यन्त भयकारी वह युद्ध मानववर्षकी गणनासे सौ वर्षोंतक चला ॥ ३६—३७ १/२ ॥ |
| बभूव भयदो नृणामृषीणां भावितात्मनाम्।<br>वरुणः प्रथमं भग्नस्ततो वायुगणः किल ॥ ३८<br>यमो विभावसुः शक्रः सर्वे ते निर्गता रणात्।<br>पलायनपरान्दृष्ट्वा देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ३९<br>वृत्रोऽपि पितरं प्रागादाश्रमस्थं मुदान्वितम्।<br>प्रणम्य प्राह त्वष्टारं पितः कार्यं मया कृतम् ॥ ४० | उस युद्धमें सबसे पहले वरुण और उसके बाद मरुद्गण पलायन कर गये। इसी प्रकार यम, अग्नि, इन्द्र—जो भी थे वे सभी युद्धसे निकल भागे। इन्द्र आदि प्रमुख देवताओंको भागकर जाते देखकर वृत्रासुर भी प्रसन्नतापूर्वक आश्रमस्थित अपने पिताके पास गया और उन्हें प्रणाम करके बोला—हे पिताजी! मैंने [आपका] कार्य कर दिया ॥ ३८—४० ॥ |
| देवा विनिर्जिताः सर्वे सेन्द्राः समरसंस्थिताः।<br>विद्रुतास्ते गताः स्थानं यथा सिंहान्मृगा गजाः ॥ ४१<br>इन्द्रः पदातिरगमन्मयानीतो गजोत्तमः।<br>ऐरावतोऽयं भगवन् गृहाण द्विरदोत्तमम् ॥ ४२ | युद्धभूमिमें आये हुए इन्द्रसहित सभी देवता मुझसे पराजित हो गये। वे सब उसी प्रकार भयभीत होकर अपने स्थानोंको भाग गये, जैसे सिंहसे डरकर हाथी और मृग भाग जाते हैं। इन्द्र तो पैदल ही भाग गये; मैं हाथियोंमें श्रेष्ठ इस ऐरावतको ले आया हूँ। हे भगवन्! आप इस गजश्रेष्ठको ग्रहण करें ॥ ४१-४२ ॥ |
| न हतास्ते मया यस्मादयुक्तं भीतमारणम्।<br>आज्ञापय पुनस्तात किं करोमि तवेप्सितम् ॥ ४३ | मैंने उन सबको इसलिये नहीं मारा; क्योंकि डरे हुएको मारना अनुचित होता है। हे तात! आप पुनः आज्ञा कीजिये कि मैं आपका कौन-सा इच्छित कार्य करूँ? ॥ ४३ ॥ |