भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 747
७३८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पादौ प्रणम्य शिरसा प्रणयाद्विधातु-<br>र्बद्धाञ्जलिः पुरत एव समाससाद।<br>प्रोवाच तं सुवरदं तपसा प्रसन्नं<br>प्रेम्णातिगद्गदगिरा विनयेन नम्रः॥ ६प्रेमपूर्वक विधाता ब्रह्माजीके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर वह उनके समक्ष स्थित हो गया और तपस्यासे प्रसन्न तथा उत्तम वर देनेवाले ब्रह्माजीसे विनयावनत होकर प्रेमपूर्ण गद्गद वाणीमें कहने लगा— ॥ ६॥
प्राप्तं मया सकलदेवपदं प्रभोऽद्य<br>यद्दर्शनं तव सुदुर्लभमाशु जातम्।<br>वाञ्छास्ति नाथ मनसि प्रवणे दुरापा<br>तां ब्रब्रवीमि कमलासन वेत्सि भावम्॥ ७हे प्रभो! मैंने आज समस्त देवताओंका पद प्राप्त कर लिया जो कि मुझे शीघ्र ही आपका अत्यन्त दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो गया। हे नाथ! हे कमलासन! आप सबके मनके भाव जानते हैं, फिर भी मेरे भक्तिपूर्ण मनमें एक दुर्लभ अभिलाषा है, उसे मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ७॥
मृत्युश्च मा भवतु मे किल लोहकाष्ठ-<br>शुष्कार्द्रवंशनिचयैरपरैश्च शस्त्रैः।<br>वृद्धिं प्रयातु मम वीर्यमतीव युद्धे<br>यस्माद्द्भवामि सबलैर्म्मरैरजेयः॥ ८लोहे, काष्ठ, सूखे या गीले बाँसद्वारा निर्मित तथा अन्य किसी शस्त्रसे मेरी कभी मृत्यु न हो। मेरा पराक्रम अत्यन्त बढ़ जाय, जिससे युद्धमें मैं उन बलवान् देवताओंसे अजेय हो जाऊँ॥ ८॥
व्यास उवाच<br>इत्थं सम्प्रार्थितो ब्रह्मा तमाह प्रहसन्निव।<br>उत्तिष्ठ गच्छ भद्रं ते वाञ्छितं सफलं सदा॥ ९व्यासजी बोले— उसके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर ब्रह्माजी उससे हँसते हुए बोले—[हे वत्स!] उठो और [घर] जाओ, तुम्हारा मनोरथ निश्चय ही पूर्ण होगा। तुम्हारा कल्याण हो॥ ९॥
न शुष्केण न चार्द्रेण न पाषाणेन दारुणा।<br>भविष्यति च ते मृत्युरिति सत्यं ब्रवीम्यहम्॥ १०न सूखी, न गीली वस्तुसे, न तो पत्थर या लकड़ीद्वारा निर्मित शस्त्रसे ही तुम्हारी मृत्यु होगी—यह मैं सत्य कह रहा हूँ॥ १०॥
इति दत्त्वा वरं ब्रह्मा जगाम भुवनं परम्।<br>वृत्रस्तु तं वरं लब्ध्वा मुदितः स्वगृहं ययौ॥ ११ऐसा वरदान देकर ब्रह्माजी अपने दिव्य लोकको चले गये और वृत्रासुर भी वरदान प्राप्तकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घर चला गया॥ ११॥
शशंस पितुरग्रे तद्वरदानं महामतिः।<br>त्वष्टा तु मुदितः प्राप्तं पुत्रं प्राप्तवरं तदा॥ १२महाबुद्धिमान् वृत्रासुरने पिताके सम्मुख उस वरदानको सुनाया, तब त्वष्टा भी पुत्रके वरदान प्राप्त करनेसे अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ १२॥
स्वस्ति तेऽस्तु महाभाग जहि शक्रं रिपुं मम।<br>हत्वागच्छ त्रिशिरसो हन्तारं पापसंयुक्तम्॥ १३उन्होंने कहा—हे महाभाग! तुम्हारा कल्याण हो, मेरे शत्रु और त्रिशिराके हत्यारे पापी इन्द्रको मार डालो; उसे मारकर आ जाओ॥ १३॥
भव त्वं त्रिदशाधीशः सम्प्राप्य विजयं रणे।<br>ममाधिं छिन्धि विपुलं पुत्रनाशसमुद्भवम्॥ १४युद्धमें विजय प्राप्तकर तुम देवताओंके अधिपति बनो। पुत्रहत्यासे उत्पन्न मेरे महान् मानसिक सन्तापको तुम दूर करो॥ १४॥
जीवतो वाक्यकरणात्क्षयाहे भूरिभोजनात्।<br>गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता॥ १५जीवित [अवस्थामें] पिताकी आज्ञाका पालन करने, मृत्युकतिथिपर पर्याप्त भोजन कराने तथा गयामें पिण्डदान करने—इन तीनोंसे ही पुत्रका पुत्रत्व सार्थक होता है॥ १५॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 B