भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 761
७५२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ६

| व्यास उवाच | **व्यासजी बोले—**ऋषियोंने उससे आदरपूर्वक कहा—'ठीक है' और तत्पश्चात् देवराज इन्द्रको वहाँ बुलाकर उन्हें वह शर्त सुना दी। इन्द्रने भी मुनियोंकी उपस्थितिमें अग्निको साक्षी करके शपथें लीं और वे सन्तापसे मुक्त हो गये। वृत्रासुर भी उनकी बातोंसे विश्वासमें आ गया और इन्द्रके साथ मित्रकी भाँति व्यवहारपरायण हो गया॥ ३५—३७\frac{१}{२}॥ | | ऋषयस्तं तदा प्राहुर्बाढमित्येव चादृताः ॥ ३५<br>समयं श्रावयामासुस्तत्रानीय सुरेश्वरम् ।<br>इन्द्रोऽपि शपथांस्तत्र चकार विगतज्वरः ॥ ३६<br>साक्षिणं पावकं कृत्वा मुनीनां सन्निधौ किल ।<br>वृत्रस्तु वचनैस्तस्य विश्वासमगमत्तदा ॥ ३७ | | | बभूव मित्रवच्चक्रे सहचर्यापरायणः ।<br>कदाचिन्नन्दने चोभौ कदाचिद् गन्धमादने ॥ ३८<br>कदाचिदुदधेस्तीरे मोदमानौ विचेरतुः ।<br>एवं कृते च सन्धाने वृत्रः प्रमुदितोऽभवत् ॥ ३९<br>शक्रोऽपि वधकामस्तु तदुपायमचिन्तयत् ।<br>रन्ध्रान्वेषी समुद्विग्नस्तदासीन्मघवा भृशम् ॥ ४० | वे दोनों कभी नन्दनवनमें, कभी गन्धमादनपर्वतपर और कभी समुद्रके तटपर आनन्दपूर्वक विचरण करते थे। इस प्रकार सन्धि हो जानेपर वृत्रासुर बहुत प्रसन्न रहता था। लेकिन वधकी इच्छावाले इन्द्र उसके वधके उपाय सोचा करते थे। इन्द्र उसकी कमजोरी ढूँढ़नेके लिये सदा उद्विग्न रहते थे॥ ३८—४०॥ | | एवं चिन्तयतस्तस्य कालः समभवर्तत ।<br>विश्वासं परमं प्राप वृत्रः शक्रेऽतिदारुणे ॥ ४१<br>एवं कतिचिदब्दानि गतानि समये कृते ।<br>वृत्रस्य मरणोपायान्मनसीन्द्रोऽप्यचिन्तयत् ॥ ४२ | इन्द्रके इस प्रकार विचार करते हुए कुछ समय बीत गया। वृत्रासुरको अत्यन्त क्रूर इन्द्रपर अत्यधिक विश्वास हो गया। इस प्रकार सन्धिके कुछ वर्ष बीत जानेपर इन्द्रने मन-ही-मन वृत्रासुरके मरणका उपाय सोच लिया॥ ४१—४२॥ | | त्वष्टैकदा सुतं प्राह विश्वस्तं पाकशासने ।<br>पुत्र वृत्र महाभाग शृणु मे वचनं हितम् ॥ ४३<br>न विश्वासस्तु कर्तव्यः कृतवैरे कथञ्चन ।<br>मघवा कृतवैरस्ते सदासूयापरः परैः ॥ ४४ | एक बार त्वष्टाने इन्द्रपर बहुत अधिक विश्वास करनेवाले पुत्रसे कहा—हे पुत्र वृत्रासुर! हे महाभाग! मेरी हितकर बात सुनो, जिसके साथ शत्रुता हो चुकी हो, उसका विश्वास कभी नहीं करना चाहिये। इन्द्र तुम्हारा शत्रु है, वह दूसरोंके द्वारा तुम्हारे गुणोंमें सदा दोष ढूँढ़ा करता है॥ ४३-४४॥ | | लोभान्मत्तो द्वेषरतः परदुःखोत्सवान्वितः ।<br>परदारलम्पटः स पापबुद्धिः प्रतारकः ॥ ४५<br>रन्ध्रान्वेषी द्रोहपरो मायावी मदगर्वितः ।<br>यः प्रविश्योदरे मातर्गर्भच्छेदं चकार ह ॥ ४६<br>सप्तकृत्वः सप्तकृत्वः क्रन्दमानमनातुरः ।<br>तस्मात्पुत्र न कर्तव्यो विश्वासस्तु कथञ्चन ॥ ४७<br>कृतपापस्य का लज्जा पुनः पुत्र प्रकुर्वतः । | वह सदा लोभसे उन्मत्त रहनेवाला, सबसे द्वेष रखनेवाला, दूसरोंका दुःख देखकर सुखी रहनेवाला, परस्त्रीगामी, पापबुद्धि, कपटी, छिद्रान्वेषी, दूसरोंसे द्रोह करनेवाला, मायावी और अहंकारी है, जिसने कि एक बार माताके उदरमें प्रवेश करके उसके गर्भको सात भागोंमें काट डाला। तब उन्हें रोते देखकर उस निर्दयीने उनके भी पृथक्-पृथक् सात भाग कर दिये।* इसलिये हे पुत्र! उसपर किसी प्रकार भी विश्वास नहीं करना चाहिये। हे पुत्र! पाप करनेवालेको दोबारा पाप करनेमें क्या लज्जा!॥ ४५—४७\frac{१}{२}॥ |


* वे ही उनचास मरुद्गण बने।