देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ७५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इति शप्त्वा सुरेशानं त्वष्टा तापसमन्वितः।<br>मेरोः शिखरमास्थाय तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ १६ | इस प्रकार देवराज इन्द्रको शाप देकर सन्तप्त त्वष्टा सुमेरुपर्वतके शिखरका आश्रय लेकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥ १६॥ |
| जनमेजय उवाच<br>हत्वा त्वाष्ट्रं सुरेशोऽथ कामवस्थामवाप्तवान्।<br>सुखं वा दुःखमेवाग्रे तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १७ | जनमेजय बोले— हे पितामह ! वृत्रासुरको मारनेके बाद इन्द्रकी क्या दशा हुई ? उन्हें बादमें सुख मिला या दुःख, इसे मुझे बताइये॥ १७॥ |
| व्यास उवाच<br>किं पृच्छसि महाभाग सन्देहः कीदृशस्तव।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ १८<br><br>बलिष्ठैर्दुर्बलैर्वापि स्वल्पं वा बहु वा कृतम्।<br>सर्वथैव हि भोक्तव्यं सदेवासुरमानुषैः॥ १९ | व्यासजी बोले— हे महाभाग ! तुम क्या पूछ रहे हो, [इस विषयमें] तुम्हें क्या सन्देह है ? किये गये शुभ-अशुभ कर्मका फल तो अवश्य ही भोगना पड़ता है। देवता, राक्षस और मनुष्यसहित बलवान् या दुर्बल कोई भी हो—सभीको अपने द्वारा किये गये अत्यन्त अल्प या अधिक कर्मका फल सर्वथा भोगना ही पड़ता है॥ १८-१९॥ |
| शक्रायेत्थं मतिर्दत्ता हरिणा वृत्रघातिने।<br>प्रविष्टोऽथ पविं विष्णुः सहायः प्रत्यपद्यत॥ २०<br><br>न चापदि सहायोऽभूद्वासुदेवः कथञ्चन।<br>समये स्वजनः सर्वः संसारेऽस्मिन्नराधिप॥ २१<br><br>दैवे विमुखतां प्राप्ते न कोऽप्यस्ति सहायवान्।<br>पिता माता तथा भार्या भ्राता वाथ सहोदरः॥ २२<br><br>सेवको वापि मित्रं वा पुत्रश्चैव तथौरसः।<br>प्रतिकूले गते दैवे न कोऽप्येति सहायताम्॥ २३ | भगवान् विष्णुने वृत्रघाती इन्द्रको इस प्रकारकी मति प्रदान की थी। वे विष्णु उनके वज्रमें प्रविष्ट हुए थे तथा उनके सहायक बने थे; परंतु विपत्तिमें उन्होंने किसी भी तरह सहायता नहीं की। हे राजन् ! इस संसारमें अच्छे समयमें सभी लोग अपने बन जाते हैं, किंतु दैवके प्रतिकूल होनेपर कोई भी सहायक नहीं होता। पिता, माता, पत्नी, सहोदर भाई, सेवक, मित्र एवं औरस पुत्र—कोई भी दैवके प्रतिकूल हो जानेपर सहायता नहीं करता। पाप या पुण्य करनेवाला ही उसका भागी होता है॥ २०–२३ १/२॥ |
| भोक्ता पापस्य पुण्यस्य कर्ता भवति सर्वथा।<br>वृत्रं हत्वा गताः सर्वे निस्तेजस्कः शचीपतिः॥ २४<br><br>शेपुस्तं त्रिदशाः सर्वे ब्रह्महत्येत्यब्रुवञ्छनैः।<br>को नाम शपथान्कृत्वा सत्यं दत्त्वा वचः पुनः॥ २५<br><br>जिघांसति सुविश्वस्तं मुनिं मित्रत्वमागतम्।<br>देवगोष्ठ्यां सुरोद्याने गन्धर्वाणां समागमे॥ २६<br><br>सर्वत्रैव कथा तस्य विस्तारमगमत्किल।<br>किं कृतं दुष्कृतं कर्म शक्रेणाद्य जिघांसता॥ २७<br><br>वृत्रं छलेन विश्वस्तं मुनिभिश्च प्रतारितम्।<br>वेदप्रमाणमुत्सृज्य स्वीकृतं सौगतं मतम्॥ २८ | वृत्रके मारे जानेपर अन्य सभी लोग चले गये; इन्द्र तेजहीन हो गये। सभी देवता उसकी निन्दा करने लगे और ‘यह ब्रह्महत्या है’—ऐसा मन्द स्वरमें कहने लगे। कौन ऐसा होगा जो शपथ खाकर और वचन देकर अत्यन्त विश्वासमें आये हुए तथा मित्रताको प्राप्त मुनिको मारनेकी इच्छा करेगा ! उसकी यह बात देवताओंकी सभामें, देवोद्यानमें तथा गन्धर्वोंके समाजमें सर्वत्र फैल गयी। हत्या करनेकी इच्छावाले इन्द्रने आज यह कैसा दुष्कृत कर्म कर डाला ! मुनियोंके द्वारा विश्वास दिलाये गये वृत्रासुरको छलपूर्वक मार करके (मानो) इन्द्रने वेदोंकी प्रामाणिकताका त्यागकर सौगतोंका मत स्वीकार कर लिया। इन्द्रने छल करके अत्यन्त साहससे शत्रुको |