भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 767

| ७५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गन्धर्वाणां तथा गेयं नृत्यमप्सरसां पुनः ।<br>न त्वं सुखकरा नारी नाना च सुरयोषितः ॥ ४३<br>न तथा कामधेनुश्च देववृक्षः सुखप्रदः ।<br>किं करोमि क्व गच्छामि क्व शर्म मम जायते ॥ ४४<br>इति चिन्तापरः कान्ते न लभे सुखमात्मनि ।गान और अप्सराओंका नृत्य तथा यहाँतक कि तुम और अन्य देवांगनाएँ भी मुझे सुखकर नहीं लगतीं। न कामधेनु और न ही कल्पवृक्ष मुझे सुख प्रदान करते हैं। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मुझे शान्ति कहाँ मिलेगी? हे प्रिये! इसी चिन्तामें पड़ा हुआ मैं अपने मनमें शान्ति नहीं प्राप्त कर पा रहा हूँ॥ ४१–४४ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा वचनं शक्रः प्रियां परमकातराम् ॥ ४५<br>निर्जगाम गृहान्मन्दो मानसं सर उत्तमम् ।<br>पद्मनाले प्रविष्टोऽसौ भयार्तः शोककर्षितः ॥ ४६<br>न प्राज्ञायत देवेन्द्रस्त्वभिभूतश्च कल्मषैः ।<br>प्रतिच्छन्नो वसत्यप्सु चेष्टमान इवोरगः ॥ ४७<br>असहायस्तुराषाडैच्चिन्तार्तो विकलेन्द्रियः ।व्यासजी बोले— अत्यन्त घबरायी हुई अपनी प्रिय पत्नीसे ऐसा कहकर मूढ़ इन्द्र घरसे निकल पड़े और उत्तम मानसरोवरको चले गये। भयसे पीडित और शोककन्तप्त होकर वे एक कमलनालमें प्रविष्ट हो गये। पापकर्मोंसे पराभूत हुए देवराज इन्द्रको कोई जान नहीं सका। वे सर्पके समान चेष्टा करते हुए जलमें छिपकर रह रहे थे। उस समय वे इन्द्र असहाय, चिन्तित और व्याकुल इन्द्रियोंवाले हो गये॥ ४५–४७ १/२॥
ततः प्रनष्टे देवेन्द्रे ब्रह्महत्याभयार्दिते ॥ ४८<br>सुराश्चिन्तातुराश्चासन्नुत्पाताश्चाभवन्नथ ।<br>ऋषयः सिद्धगन्धर्वा भयार्ताश्चाभवन्भृशम् ॥ ४९<br>अराजकं जगत्सर्वमभिभूतमुपद्रवैः ।<br>अवर्षणं तदा जातं पृथिवी क्षीणवैभवा ॥ ५०<br>विच्छिन्नस्रोतसो नद्यः सरांस्यनुदकानि वै ।<br>एवं त्वराजके जाते देवता मुनयस्तथा ॥ ५१<br>विचार्य नहुषं चक्रुः शक्रं सर्वे दिवौकसः ।ब्रह्महत्याके भयसे दुःखी होकर देवराज इन्द्रके अदृश्य हो जानेपर देवगण चिन्तातुर हो उठे तथा अनेक प्रकारके उत्पात होने लगे। ऋषि, सिद्ध और गन्धर्वगण भी अत्यन्त भयभीत हो गये। उपद्रवोंके होनेसे सम्पूर्ण जगत् अराजकतासे ग्रस्त हो गया। उस समय अनावृष्टि उपस्थित हो गयी और पृथिवी वैभवशून्य हो गयी, नदियोंके स्रोत सूख गये और तालाब बिना जलके हो गये—इस प्रकारकी अराजकताको देखकर स्वर्गके देवताओं और मुनियोंने विचार करके नहुषको इन्द्र बना दिया॥ ४८–५१ १/२॥
सम्प्राप्य नहुषो राजा धर्मिष्ठोऽपि रजोबलात् ॥ ५२<br>बभूव विषयासक्तः पञ्चबाणशराहतः ।<br>अप्सरोभिर्वृतः क्रीडन्देवोद्यानेषु भारत ॥ ५३राज्य प्राप्त करनेपर राजा नहुष धर्मात्मा होते हुए भी राजसी वृत्तिके कारण कामबाणसे आहत हो विषयासक्त हो गये। हे भारत! देवोद्यानोंमें क्रीडारत रहते हुए वे सदा अप्सराओंसे घिरे रहते थे॥ ५२-५३॥
शक्रपत्नीगुणाञ्छ्रुत्वा चकमे तां स पार्थिवः ।<br>ऋषीनाह किमिन्द्राणी नोपगच्छति मां किल ॥ ५४<br>भवद्भिश्चामरैः सर्वैः कृतोऽहं वासवस्त्विह ।<br>प्रेषयध्वं सुराः कामं सेवार्थं मम वै शचीम् ॥ ५५<br>प्रियं चेन्मम कर्तव्यं सर्वथा मुनयोऽमराः ।<br>अहमिन्द्रोऽद्य देवानां लोकानां च तथेश्वरः ॥ ५६<br>आगच्छतु शची मह्यं क्षिप्रमद्य निवेशनम् ।उस राजा नहुषके मनमें इन्द्राणी शचीके गुणोंको सुनकर उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा हुई। उसने ऋषियोंसे कहा—मेरे पास इन्द्राणी क्यों नहीं आती? आपलोग और देवताओंने मुझे इन्द्र बनाया, इसलिये हे देवताओ! शचीको मेरी सेवाके लिये भेजिये। हे मुनियो तथा देवताओ! आपलोगोंको मेरा प्रिय कार्य अवश्य करना चाहिये। इस समय मैं देवताओंका इन्द्र और समस्त लोकोंका स्वामी हूँ; शची शीघ्र ही आज मेरे भवनमें आ जायँ॥ ५४—५६ १/२॥