देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 779, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- |
| विचरिष्यसि वीर्येण पुनः स्वर्गमवाप्स्यसि।<br>दृष्ट्वा युधिष्ठिरं नाम तव मोक्षो भविष्यति॥ ५६<br>प्रश्नानामुत्तरं श्रुत्वा धर्मपुत्रमुखात्ततः। | करोगे। युधिष्ठिर नामवाले धर्मपुत्रका दर्शनकर और उनके मुखसे अपने प्रश्नोंके उत्तर सुनकर तुम्हारी मुक्ति हो जायगी॥ ५४–५६ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>एवं शप्तः स राजर्षिः स्तुत्वा तं मुनिसत्तमम्॥ ५७<br>स्वर्गात्पपात सहसा सर्परूपधरोऽभवत्। | **व्यासजी बोले—**इस प्रकार शाप प्राप्तकर राजर्षि नहुष उन मुनिश्रेष्ठकी स्तुति करके अचानक स्वर्गसे गिर पड़ा और सर्परूपधारी हो गया॥ ५७ १/२॥ | | बृहस्पतिस्ततो गत्वा तरसा मानसं प्रति॥ ५८<br>इन्द्राय सर्ववृत्तान्तं कथयामास विस्तरात्।<br>तच्छ्रुत्वा मघवा राज्ञः स्वर्गात्प्रच्यवनादिकम्॥ ५९<br>मुदितोऽभून्महाराज स्थितस्तत्रैव वासवः।<br>देवाश्च मुनयो दृष्ट्वा नहुषं पतितं भुवि॥ ६०<br>जग्मुः सर्वेऽपि तत्रैव यत्रेन्द्रः सरसि स्थितः। | तब बृहस्पतिने शीघ्रतापूर्वक मानसरोवर जाकर इन्द्रसे सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कहा। हे महाराज (जनमेजय)! राजा नहुषके स्वर्गसे पतन आदिकी बात सुनकर इन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। वे इन्द्र अब भी वहींपर स्थित रहे। सभी देवता और मुनि नहुषको पृथ्वीपर गिरा देखकर उसी सरोवरके पास गये, जहाँ इन्द्र रहते थे॥ ५८–६० १/२॥ | | तमाश्वास्य सुराः सर्वे मुनिभिः सहितास्तदा॥ ६१<br>स्वर्गे समानयामासुर्मानपूर्वं शचीपतिम्।<br>समागतं ततः शक्रं सर्वे ते मुनयः सुराः॥ ६२<br>स्थापयित्वासने पश्चादभिषेकं दधुः शिवम्।<br>इन्द्रोऽपि स्वासनं प्राप्य शच्या सह सुरालये॥ ६३<br>चिक्रीड नन्दने रम्ये कानने प्रेमयुक्तया। | तत्पश्चात् उन शचीपति इन्द्रको आश्वासन देकर मुनियोंसहित सभी देवता उन्हें सम्मानपूर्वक स्वर्ग ले आये। तदनन्तर वापस आये हुए उन इन्द्रको सभी मुनियों और देवताओंने आसनपर स्थापित करके उनका पवित्र अभिषेक किया। इन्द्र भी अपने पदको प्राप्तकर प्रेमयुक्त शचीके साथ देवप्रासाद और मनोहर नन्दनवनमें क्रीड़ा करने लगे॥ ६१–६३ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>एवमिन्द्रेण सम्प्राप्तं दुःखं परमदारुणम्॥ ६४<br>हत्वासुरं कामरूपं विश्वरूपं महामुनिम्।<br>पुनर्देव्याः प्रसादेन स्वस्थानं प्राप्तवान्नृप॥ ६५ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले महामुनि विश्वरूप और वृत्रासुरको मारनेके कारण इन्द्रको अत्यन्त भीषण दुःख प्राप्त हुआ और देवीकी कृपासे उन्होंने पुनः अपना स्थान प्राप्त कर लिया॥ ६४-६५॥ | | एतत्ते सर्वमाख्यातं वृत्रासुरवधाश्रयम्।<br>यत्पृष्टोऽहं त्वया राजन् कथानकमनुत्तमम्॥ ६६ | हे राजन्! इस प्रकार आपने मुझसे जो पूछा था, वृत्रासुरवधपर आधारित वह सम्पूर्ण उत्तम आख्यान मैंने आपको कह दिया॥ ६६॥ | | यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमाप्नुयात्।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ ६७ | जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा फल प्राप्त होता है। किये गये शुभ-अशुभ कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है॥ ६७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां षष्ठस्कन्धे नहुषस्वर्गच्युतिवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 B