भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 782
अ० १० ]षष्ठ स्कन्ध७७३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरीरं प्राणिनां नूनं भाजनं सुखदुःखयोः।<br>शरीरी प्राप्नुयात्कामं सुखं दुःखमनन्तरम्॥ २८प्राणियोंका शरीर सुख-दुःखका भाजन होता है; शरीरधारी सुख-दुःख प्राप्त करता रहता है॥ २८॥
देही नास्ति वशः कोऽपि दैवाधीनः सदैव हि।<br>जननं मरणं दुःखं सुखं प्राप्नोति चावशः॥ २९कोई भी प्राणी स्वतन्त्र नहीं है, बल्कि सदैव दैवके अधीन रहता है। वह विवश होकर जन्म, मरण, सुख तथा दुःख प्राप्त करता है॥ २९॥
पाण्डवास्ते वने जाताः प्राप्तास्तु स्वगृहं पुनः।<br>स्वबाहुबलतः पश्चाद्राजसूयं क्रतूत्तमम्॥ ३०<br>वनवासं पुनः प्राप्ता बहुदुःखकरं परम्।<br>अर्जुनेन तपस्तप्तं दुष्करं ह्यजितेन्द्रियैः॥ ३१<br>सन्तुष्टैस्तु सुरैर्दत्तं वरदानं पुनः शुभम्।<br>नरदेहकृतं पुण्यं क्व गतं वनवासजम्॥ ३२<br>नरदेहे तपस्तप्तं चोग्रं बदरिकाश्रमे।<br>नार्जुनस्य शरीरे तत्फलदं सम्बभूव ह॥ ३३दैववश ही पाण्डव वन गये और पुनः उन्होंने अपना राज्य प्राप्त किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने बाहुबलसे राजसूय नामक उत्तम यज्ञ किया और बादमें अत्यन्त दुःखदायक वनवास उन्हें पुनः प्राप्त हुआ। वहाँ अर्जुनने अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये दुष्कर तपस्या की। तब [उस तपस्यासे] सन्तुष्ट होकर देवताओंने उन्हें कल्याणकारी वरदान दिया। उस वनवास और नरावतारमें किया गया पुण्य कहाँ गया ? नरावतारमें उन्होंने बदरिकाश्रममें उग्र तपस्या की थी, परंतु अर्जुनके रूपमें उन्हें उस तपस्याका फल नहीं मिला!॥ ३०—३३॥
प्राणिनां देहसम्बन्धे गहना कर्मणो गतिः।<br>दुर्ज्ञेया सर्वथा दैवर्मानवानां तु का कथा॥ ३४प्राणियोंके देह-सम्बन्धी कर्मोंकी गति अत्यन्त गहन है; यह देवताओंके लिये भी दुर्ज्ञेय है तो मनुष्योंकी क्या बात !॥ ३४॥
वासुदेवोऽपि सञ्जातः कारागारेऽतिसङ्कटे।<br>नीतोऽसौ वसुदेवेन नन्दगोपस्य गोकुलम्॥ ३५<br>एकादशैव वर्षाणि संस्थितस्तत्र भारत।<br>पुनः स मथुरां गत्वा जघानोग्रसुतं बलात्॥ ३६<br>मोचयामास पितरौ बन्धनाद् भृशदुःखितौ।<br>उग्रसेनं च राजानञ्चकार मथुरापुरे॥ ३७<br>जगाम द्वारवत्यां स म्लेच्छराजभयात्पुनः।<br>सर्वं भाविवशात्कृष्णः कृतवान्पौरुषं महत्॥ ३८वासुदेव श्रीकृष्ण भी अत्यन्त संकटमय कारागारमें उत्पन्न हुए और वसुदेवके द्वारा गोकुलमें नन्दगोपके घर ले जाये गये। हे भारत! वे वहाँ ग्यारह वर्षतक रहे और पुनः मथुरा जाकर उन्होंने बलपूर्वक उग्रसेनके पुत्र कंसका वध किया। तदनन्तर अत्यन्त दुःखित माता-पिताको बन्धनसे मुक्त किया तथा उग्रसेनको मथुरापुरीका राजा नियुक्त किया। पुनः वे म्लेच्छराज कालयवनके भयसे द्वारका चले गये। श्रीकृष्णने यह सब महान् पराक्रम दैवके अधीन होकर ही किया॥ ३५—३८॥
कृत्वा कार्याण्यनेकानि द्वारवत्यां जनार्दनः।<br>देहं त्यक्त्वा प्रभासे तु सकुदुम्बो दिवं गतः॥ ३९<br>पुत्राः पौत्राश्च सुहृदो भ्रातरो जामयस्तथा।<br>प्रभासे यादवाः सर्वे विप्रशापात्क्षयं गताः॥ ४०<br>एवं ते कथिता राजन् कर्मणो गहना गतिः।<br>वासुदेवोऽपि व्याधस्य बाणेन निधनं गतः॥ ४१वे जनार्दन श्रीकृष्ण द्वारकामें अनेक कार्य करके और प्रभासक्षेत्रमें देहका परित्यागकर अपने कुटुम्बसहित स्वर्ग चले गये। विप्रशापके कारण समस्त यादवगण पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, भाइयों और बहनोंसहित प्रभासक्षेत्रमें नष्ट हो गये और वासुदेव श्रीकृष्ण भी व्याधके बाणसे निधनको प्राप्त हुए। हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे कर्मकी गहन गतिका वर्णन कर दिया॥ ३९—४१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
कर्मणां गहनगतिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥