देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 787, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
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| जनमेजय उवाच<br>भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ॥ ५५<br>कलावधर्मबहुले नराणां का गतिर्भवेत्।<br>यद्यस्ति तदुपायश्चेद्दया तं वदस्व मे ॥ ५६ | जनमेजय बोले— हे भगवन्! हे समस्त धर्मोंके ज्ञाता! हे समस्त शास्त्रोंमें निपुण! अधर्मके बाहुल्यवाले कलियुगमें मनुष्योंकी क्या गति होती है? यदि उससे निस्तारका कोई उपाय हो तो उसे दयापूर्वक मुझे बतलाइये॥ ५५-५६॥ | | व्यास उवाच<br>एक एव महाराज तत्रोपायोऽस्ति नापरः।<br>सर्वदोषनिरासार्थं ध्यायेद्देवीपदाम्बुजम् ॥ ५७<br>न सन्त्यघानि तावन्ति यावती शक्तिरस्ति हि।<br>नाम्नि देव्याः पापदाहे तस्माद्भीतिः कुतो नृप ॥ ५८<br>अवशेनापि यन्नाम लीलयोच्चारितं यदि।<br>किं किं ददाति तज्ज्ञातुं समर्था न हरादयः ॥ ५९ | व्यासजी बोले— हे महाराज! इसका एक ही उपाय है दूसरा नहीं है; समस्त पापोंके शमनके लिये देवीके चरणकमलका ध्यान करना चाहिये। हे राजन्! देवीके पापदाहक नाममें जितनी शक्ति है, उतने पाप तो हैं ही नहीं। इसलिये भयकी क्या आवश्यकता? यदि विवशतापूर्वक भी भगवतीके नामका उच्चारण हो जाय, तो वे क्या-क्या दे देती हैं, उसे जाननेमें भगवान् शंकर आदि भी समर्थ नहीं हैं!॥ ५७-५९॥ | | प्रायश्चित्तं तु पापानां श्रीदेवीनामसंस्मृतिः।<br>तस्मात्कलिभयाद्राजन् पुण्यक्षेत्रे वसेन्नरः ॥ ६०<br>निरन्तरं पराम्बाया नामसंस्मरणं चरेत्।<br>छित्त्वा भित्त्वा च भूतानि हत्वा सर्वमिदं जगत् ॥ ६१ | भगवती देवीके नामका स्मरण ही समस्त पापोंका प्रायश्चित्त है, इसलिये हे राजन्! मनुष्यको कलिके भयसे पुण्यक्षेत्रमें निवास करना चाहिये और पराम्बाके नामका निरन्तर स्मरण करना चाहिये। जो देवीको भक्तिभावसे नमस्कार करता है, वह प्राणियोंका छेदन-भेदन और सारे संसारको पीड़ित करके भी उन पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ६०-६१ १/२॥ | | देवीं नमति भक्त्या यो न स पापैर्विलिप्यते।<br>रहस्यं सर्वशास्त्राणां मया राजन्नुदीरितम् ॥ ६२<br>विमृश्यैतदशेषेण भज देवीपदाम्बुजम्।<br>अजपां नाम गायत्रीं जपन्ति निखिला जनाः ॥ ६३<br>महिमानं न जानन्ति मायाया वैभवं महत्।<br>गायत्रीं ब्राह्मणाः सर्वे जपन्ति हृदयान्तरे ॥ ६४<br>महिमानं न जानन्ति मायाया वैभवं महत्।<br>एतत्सर्वं समाख्यातं यत्पृष्टं तत्त्वया नृप।<br>युगधर्मव्यवस्थायां किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ६५ | हे राजन्! यह मैंने आपसे सम्पूर्ण शास्त्रोंके रहस्यको कह दिया, इसपर भलीभाँति विचारकर आप देवीके चरणकमलकी आराधना करें। [वैसे तो] सभी लोग 'अजपा' नामक गायत्रीका जप करते हैं, लेकिन वे [मायासे मोहित होनेके कारण] उन महामायाकी महिमा और महान् वैभवको नहीं जानते। सभी ब्राह्मण अपने हृदयमें गायत्रीका जप करते हैं, परंतु वे भी उन महामायाकी महिमा और उनके महान् वैभवको नहीं जानते। हे राजन्! युगधर्मकी व्यवस्थाके विषयमें आपने जो कुछ पूछा था, यह सब मैंने कह दिया, अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ६२-६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे युगधर्मव्यवस्थावर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥