देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 796, कुल 889 में से
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| अ० १३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न कृतं वचनं राज्ञा कौशिकस्य महात्मनः।<br>रोषं दधार मनसा राजोपरि स गाधिजः॥ ३० | राजाने महात्मा विश्वामित्रकी बात नहीं मानी, अतः वे गाधिपुत्र विश्वामित्र मन-ही-मन राजाके ऊपर बहुत क्रुद्ध हुए॥ ३०॥ |
| एकस्मिन्समये राजा हयारूढो वनं गतः।<br>सूकरं हन्तुकामस्तु मध्याह्ने कौशिकीतटे॥ ३१ | एक समय राजा घोड़ेपर सवार होकर वनमें गये। वे सूअरको मारनेकी इच्छासे ठीक दोपहरके समय कौशिकी नदीके तटपर पहुँचे॥ ३१॥ |
| वृद्धब्राह्मणवेषेण विश्वामित्रेण वञ्चितः।<br>सर्वस्वं प्रार्थितं तस्य गृहीतं राज्यमद्भुतम्॥ ३२ | वहाँ विश्वामित्रने वृद्ध ब्राह्मणका वेश धारण करके छलपूर्वक उनका सर्वस्व माँग लिया और उनके महान् राज्यपर अपना अधिकार कर लिया॥ ३२॥ |
| पीडितोऽसौ हरिश्चन्द्रो यजमानो यतो भृशम्।<br>वसिष्ठः कौशिकं प्राह वने प्राप्तं यदृच्छया॥ ३३<br>क्षत्रियाधम दुर्बुद्धे वृथा ब्राह्मणवेषभृत्।<br>बकधर्म वृथा किं त्वं गर्वं वहसि दाम्भिक॥ ३४ | जिससे [वसिष्ठके] यजमान राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त कष्ट पाने लगे। एक बार संयोगवश वनमें आये हुए विश्वामित्रसे वसिष्ठने कहा— हे क्षत्रियाधम! हे दुर्बुद्धे! तुमने व्यर्थ ही ब्राह्मणका वेश बना रखा है, बगुलेके समान वृत्तिवाले हे दाम्भिक! तुम व्यर्थमें गर्व क्यों करते हो?॥ ३३-३४॥ |
| कस्मात्त्वया नृपश्रेष्ठो यजमानो ममाप्यसौ।<br>अपराधं विना जाल्म गमितो दुःखमद्भुतम्॥ ३५ | हे जाल्म! तुमने मेरे यजमान नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्रको बिना अपराधके महान् कष्टमें क्यों डाल दिया?॥ ३५॥ |
| बकध्यानपरो यस्मात्तस्मात्त्वं वै बको भव।<br>इति शप्तो वसिष्ठेन कौशिकः प्राह तं पुनः॥ ३६ | तुम बगुलेके समान ध्यानपरायण हो। अतः तुम 'बक' (बगुला) हो जाओ। वसिष्ठके द्वारा इस प्रकार शापप्राप्त विश्वामित्रने उनसे कहा— |
| त्वमप्याडिर्भवायुष्मन् बकोऽहं यावदेव हि। | हे आयुष्मन्! जबतक मैं बक रहूँगा, तबतक तुम भी आडी पक्षी बनकर रहोगे॥ ३६ ½॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं परस्परं दत्त्वा शापं तौ क्रोधपीडितौ॥ ३७<br>अण्डजौ तरसा जातौ सरस्याडीबकौ मुनी।<br>एकस्मिन्पादपे नीडं कृत्वासौ बकरूपभाक्॥ ३८<br>विश्वामित्रः स्थितस्तत्र दिव्ये सरसि मानसे।<br>अन्यस्मिन्पादपे कृत्वा वसिष्ठो नीडमुत्तमम्॥ ३९<br>आडीरूपधरस्तस्थावन्योन्यं द्वेषतत्परौ।<br>दिने दिने तौ संग्रामं चक्रतुः क्रोधसंयुतौ॥ ४०<br>दुःखदं सर्वलोकानां क्रन्दमानावुभौ भृशम्।<br>चञ्चुपक्षप्रहारैस्तु नखाघातैः परस्परम्॥ ४१<br>जघ्नतू रुधिरक्लिन्नौ पुष्पिताविव किंशुकौ।<br>एवं बहूनि वर्षाणि पक्षिरूपधरौ मुनी॥ ४२<br>स्थितौ तत्र महाराज शापपाशेन यन्त्रितौ। | व्यासजी बोले— इस प्रकार क्रोधसे व्याकुल उन दोनोंने एक-दूसरेको शाप दे दिया और एक सरोवरके समीप वे दोनों मुनि 'आडी' और 'बक' के रूपमें अण्डोंसे उत्पन्न हुए। दिव्य मानसरोवरके तटपर एक वृक्षपर घोंसला बनाकर बकरूपधारी विश्वामित्र और एक दूसरे वृक्षपर उत्तम घोंसला बनाकर आडीरूपधारी वसिष्ठ परस्पर द्वेषपरायण होकर रहने लगे। वे दोनों कोपाविष्ट होकर प्रतिदिन घोर क्रन्दन करते हुए सभी लोगोंके लिये दुःखदायी युद्ध करते थे। वे दोनों चोंच और पंखोंके प्रहार तथा नखोंके आघातसे परस्पर चोट पहुँचाते थे। रक्तसे लथपथ वे दोनों खिले हुए किंशुकके फूल-जैसे प्रतीत होते थे। हे महाराज! इस प्रकार पक्षीरूपधारी दोनों मुनि शापरूपी पाशमें जकड़े हुए वहाँ बहुत वर्षोंतक पड़े रहे॥ ३७-४२ ½॥ |
| राजोवाच<br>कथं मुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ शापाद्वसिष्ठकौशिकौ॥ ४३<br>तन्ममाचक्ष्व विप्रर्षे परं कौतूहलं हि मे। | राजा बोले— हे विप्रर्षे! वे दोनों मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ और विश्वामित्र शापसे किस प्रकार मुक्त हुए, यह मुझे बताइये, मुझे बड़ा कौतूहल है॥ ४३ ½॥ |