देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 814, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० १७] | षष्ठ स्कन्ध | ८०५ |
|---|
| दर्शनाद् बालकस्याशु सर्वे जाता विलोचनाः ॥ १६ <br><br> बभ्रमुर्गिरिदुर्गेषु जन्मान्धा इव क्षत्रियाः । <br> चिन्तितं मनसा सर्वैः किमेतदिति साम्प्रतम् ॥ १७ <br><br> सर्वे चक्षुर्विहीना यज्जाताः स्म बालदर्शनात् । <br> ब्राह्मण्यास्तु प्रभावोऽयं सतीव्रतबलं महत् ॥ १८ <br><br> क्षणाद्दामोघसङ्कल्पाः किं करिष्यन्ति दुःखिताः । <br> इति सञ्चिन्त्य मनसा नेत्रहीना निराश्रयाः ॥ १९ <br><br> ब्राह्मणीं शरणं जग्मुर्हैहया गतचेतसः । <br> प्रणेमुस्तां भयत्रस्तां कृताञ्जलिपुटाश्च ते ॥ २० <br><br> ऊचुश्चैनां भयोद्विग्नां दृष्ट्यर्थं क्षत्रियर्षभाः । <br> प्रसीद सुभगे मातः सेवकास्ते वयं किल ॥ २१ <br><br> कृतापराधा रम्भोरु क्षत्रियाः पापबुद्धयः । <br> दर्शनात्तव तन्वङ्गि जाताः सर्वे विलोचनाः ॥ २२ <br><br> मुखं ते नैव पश्यामो जन्मान्धा इव भामिनि । <br> अद्भुतं ते तपो वीर्यं किं कुर्मः पापकारिणः ॥ २३ <br><br> शरणं ते प्रपन्नाः स्मो देहि चक्षूंषि मानदे । <br> अन्धत्वं मरणादुग्रं कृपां कर्तुं त्वमर्हसि ॥ २४ <br><br> पुनर्दृष्टिप्रदानेन सेवकांश्क्षत्रियान्कुरु । <br> उपरम्य च गच्छेम सहिताः पापकर्मणः ॥ २५ <br><br> अतः परं न कर्तव्यमीदृशं कर्म कर्हिचित् । <br> भार्गवाणां तु सर्वेषां सेवकाः स्मो वयं किल ॥ २६ <br><br> अज्ञानाद्यत्कृतं पापं क्षन्तव्यं तत्त्वयाधुना । <br> वैरं नातः परं क्वापि भृगुभिः क्षत्रियैः सह ॥ २७ <br><br> कर्तव्यं शपथैः सम्यग्वर्तितव्यं तु हैहयैः । <br> सपुत्रा भव सुश्रोणि प्रणताः स्मो वयं च ते ॥ २८ <br><br> प्रसादं कुरु कल्याणि न द्विष्यामः कदाचन । <br><br> व्यास उवाच <br> इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्राह्मणी विस्मयान्विता ॥ २९ | उस बालककी ओर देखते ही वे सभी दृष्टिहीन हो गये। तत्पश्चात् वे क्षत्रिय जन्मान्धकी भाँति पर्वतकी गुफाओंमें इधर-उधर भटकने लगे। सभी क्षत्रिय मनमें विचार करने लगे कि इस समय यह क्या हो गया है कि हम सभी लोग बालकको देखनेमात्रसे चक्षुहीन हो गये। ऐसा प्रतीत होता है कि इसी ब्राह्मणीका यह प्रभाव है; क्योंकि सतीव्रत एक महान् बल है। अमोघ संकल्पवाली दुःखित स्त्रियाँ क्षणभरमें न जाने क्या कर डालेंगी! ॥ १६-१८ १/२ ॥ <br><br> ऐसा मनमें सोचकर नेत्रहीन, निराश्रय तथा चेतना-रहित हैहयवंशी क्षत्रिय उस ब्राह्मणीकी शरणमें गये और उन्होंने भयसे त्रस्त उस स्त्रीको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। वे श्रेष्ठ क्षत्रिय अपनी नेत्रज्योतिके लिये इस भयाकुल ब्राह्मणीसे कहने लगे— ॥ १९-२० १/२ ॥ <br><br> हे सुभगे! हे माता! हम सब आपके सेवक हैं। अब आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइये। हे रम्भोरु! पाप बुद्धिवाले हम क्षत्रियोंने अपराध किया है। हे तन्वंगि! इसीलिये आपको देखते ही हम सब चक्षुविहीन हो गये। हे भामिनि! जन्मसे अन्धे व्यक्तिकी भाँति हम आपका मुखदर्शन कर पानेमें समर्थ नहीं हैं। आपका तप तथा पराक्रम अद्भुत है; हम पापपरायण कर ही क्या सकते हैं? हे मानदे! हम आपकी शरणमें हैं। हमें नेत्र दीजिये; क्योंकि नेत्रज्योतिसे विहीन हो जाना मृत्युसे भी कष्टकारक होता है। आप हमारे ऊपर कृपा कीजिये। फिरसे नेत्रज्योति देकर इन समस्त क्षत्रियोंको अपना सेवक बना लीजिये। इसके बाद पापकर्मसे रहित होकर हमलोग साथ-साथ चले जायेंगे। अब हमलोग इस प्रकारका कर्म कभी नहीं करेंगे। अब हम सभी भार्गव ब्राह्मणोंके सेवक हो गये। हमलोगोंने अज्ञानवश जो भी पाप किया है उसे आप क्षमा करें। हम हैहय क्षत्रिय शपथपूर्वक कहते हैं कि आजसे कभी भी भृगुवंशी ब्राह्मणोंके साथ हमें वैरभाव नहीं रखना चाहिये और यथोचित व्यवहार करना चाहिये। हे सुश्रोणि! आप पुत्रवती होवें। हम आपकी शरणमें हैं। हे कल्याणि! आप कृपा करें; हमलोग अब कभी भी द्वेषभाव नहीं रखेंगे ॥ २१-२८ १/२ ॥ <br><br> व्यासजी बोले— [हे राजन्!] उन क्षत्रियोंकी यह बात सुनकर ब्राह्मणी विस्मयमें पड़ गयी और उसने शरणागत तथा दुर्गतिंको प्राप्त उन नेत्रहीन |