देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 840, कुल 889 में से
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अ० २२ ] षष्ठ स्कन्ध ८३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्राप्तं ममाद्य नगरं देवलोकसमं प्रिये।<br>दासोऽस्मि तव रत्या हि कस्मात्क्रन्दसि कातरा ॥ २०<br><br>कथयैनां सखीं तेऽद्य स्वस्था भव सुलोचने।<br>इत्युक्त्वा मां सखीपार्श्वे समारोप्य रथोत्तमे ॥ २१<br><br>जगाम तरसा दुष्टः पुरे स्वस्य मनोहरे।<br>सैन्येन महता युक्तः प्रफुल्लवदनाम्बुजः ॥ २२ | सुन्दर मेरा नगर अब आ ही गया है। तुम्हारे प्रेमके कारण मैं तुम्हारा दास हो चुका हूँ। तुम भयभीत होकर क्यों विलाप कर रही हो? हे सुलोचने! अब शान्त हो जाओ'—ऐसा कहकर उसी उत्तम रथमें सखीके पास मुझे भी बैठाकर प्रसन्नताके कारण खिले हुए कमलके समान मुखवाला दुष्ट कालकेतु अपनी भारी सेनाके साथ अपने सुन्दर नगरके लिये शीघ्र ही चल दिया ॥ १९–२२ ॥ |
| एकावलीं तथा मां च संस्थाप्य धवले गृहे।<br>राक्षसान् गृहरक्षार्थं कल्पयामास कोटिशः ॥ २३ | वहाँ उस दानवने मुझे तथा एकावलीको एक दिव्य महलमें ठहराकर उस महलकी रक्षाके लिये करोड़ों राक्षस नियुक्त कर दिये ॥ २३ ॥ |
| द्वितीये दिवसे सोऽथ मामुवाच रहो नृप।<br>प्रबोधय सखीं बालां शोचन्तीं विरहातुराम् ॥ २४<br><br>पत्नी मे भव सुश्रोणि सुखं भुङ्क्ष्व यथेप्सितम्।<br>राज्यं त्वदीयं चन्द्रास्ये सेवकोऽहं सदा तव ॥ २५ | हे राजन्! दूसरे दिन उस कालकेतुने एकान्तमें मुझसे कहा—विरहसे दुःखित तथा शोक करती हुई अपनी सुन्दर सखीको [मेरे शब्दोंमें] समझाओ—'हे सुश्रोणि! तुम मेरी पत्नी हो जाओ और फिर यथेच्छ सुखोपभोग करो। हे चन्द्रमुखि! अब यह राज्य तुम्हारा है और मैं सदाके लिये तुम्हारा सेवक बन गया हूँ' ॥ २४-२५ ॥ |
| पुनरुक्तं मया वाक्यं श्रुत्वा तद्भाषितं खरम्।<br>नाहं क्षमाप्रियं वक्तुं त्वमेनां कथय प्रभो ॥ २६ | उसका ऐसा दुर्वचन सुनकर मैंने उससे यह बात कही कि हे प्रभो! मैं ऐसा अप्रिय वाक्य नहीं कह सकती, अतः आप ही इससे कहिये ॥ २६ ॥ |
| इत्युक्ते वचने दुष्टो मदनक्षतमानसः।<br>उवाच विनयादेनां सखीं क्षामोदरीं प्रियाम् ॥ २७ | मेरे ऐसा कहनेपर कामसे आहत चित्तवाले उस दुष्ट दानवने कृश उदरवाली मेरी उस प्रिय सखीसे विनयपूर्वक कहा— ॥ २७ ॥ |
| कृशोदरि त्वया मन्त्रो निक्षिप्तोऽस्ति ममोपरि।<br>तेन मे हृदयं कान्ते हृतं ते वशतां गतम् ॥ २८<br><br>तेनाहं तव दासोऽद्य कृतोऽस्मीति विनिश्चयः।<br>भज मां कामबाणेन पीडितं विवशं भृशम् ॥ २९<br><br>यौवनं याति रम्भोरु चञ्चलं दुर्लभं तदा।<br>सफलं कुरु कल्याणि पतिं मां परिरभ्य च ॥ ३० | हे कृशोदरि! तुमने मेरे ऊपर कोई मन्त्र-प्रयोग कर दिया है। हे कान्ते! उसीसे मोहित होकर मेरा मन तुम्हारे वशमें हो चुका है। उसी मन्त्रने मुझे अब तुम्हारा दास बना दिया है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। इसलिये कामबाणसे आहत मुझ अत्यन्त विवशको अब तुम स्वीकार कर लो। हे रम्भोरु! तुम्हारा दुर्लभ तथा चंचल यौवन व्यर्थ जा रहा है। इसलिये हे कल्याणि! पतिभावसे मेरा आलिंगन करके इसे सफल कर लो ॥ २८–३० ॥ |
| एकावल्युवाच<br>पित्राहं कल्पिता पूर्वं दातुं राजसुताय वै।<br>हैहयस्तु महाभाग स मया मनसा वृतः ॥ ३१ | एकावली बोली—मेरे पिता राजकुमार हैहयको मुझे देनेका पहले ही निश्चय कर चुके हैं। मैंने भी उन महाभागका मनसे वरण कर लिया है ॥ ३१ ॥ |