भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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८४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रात्रौ संक्रीडितं प्रेम्णा तया सह मया भृशम्।<br>वरो दत्तः पुनस्तस्यै प्रसन्नेन तु नारद॥ २०<br><br>सुभगे भविता पुत्रः सर्वलक्षणसंयुतः।<br>सुरूपः सर्वधर्मज्ञः सत्यवादी शमे रतः॥ २१हे नारद! रात्रिमें मैंने उसके साथ प्रेमपूर्वक विहार किया और पुनः प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया—हे सुभगे! तुम्हें सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, रूपवान्, सभी धर्मोंका ज्ञाता, सत्यवादी तथा शान्त स्वभाववाला पुत्र उत्पन्न होगा॥ २०-२१॥
स तदा विदुरो जातस्त्रयः पुत्रा मयाभवन्।<br>माया वृद्धिं गता साधो परक्षेत्रोद्भवे मम॥ २२समय आनेपर उसे विदुर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। इस प्रकार मुझसे तीन पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। हे साधो! परक्षेत्रमें मेरेद्वारा उत्पन्न किये गये इन पुत्रोंके प्रति मेरी ममता बढ़ने लगी॥ २२॥
विस्मृतः शुकसम्बन्धी विरहः शोककारणम्।<br>दृष्ट्वा त्रीन्स्वसुतान्कामं बलिनो वीर्यसम्मतान्॥ २३उन तीनों पुत्रोंको अत्यन्त बलवान् तथा वीर्यवान् देखकर मैं अपने शोकके एकमात्र कारण शुकसम्बन्धी वियोगको भूल गया॥ २३॥
माया बलवती ब्रह्मन् दुस्त्यजा ह्यकृतात्मभिः।<br>अरूपा च निरालम्बा ज्ञानिनामपि मोहिनी॥ २४हे ब्रह्मन्! माया बलवती होती है, आत्मज्ञानसे रहित पुरुषोंके लिये यह अत्यन्त दुस्त्यज है। रूपहीन तथा आलम्बरहित यह माया ज्ञानियोंको भी मोहित कर देती है॥ २४॥
मातरि स्नेहसम्बद्धं तथा पुत्रेषु संवृतम्।<br>न मे चित्तं वने शान्तिमगान्मुनिवरोत्तम॥ २५हे मुनिवर! मातामें तथा उन पुत्रोंमें स्नेहासक्तिसे आबद्ध मेरे मनको वनमें भी शान्ति नहीं मिल पाती थी॥ २५॥
दोलारूढं मनो जातं कदाचिद्धस्तिनापुरे।<br>पुनः सरस्वतीतीरे न चैकत्र व्यवस्थितिः॥ २६मेरा मन दोलायमान हो गया। वह कभी हस्तिनापुरमें रहता था तो कभी सरस्वतीनदीके तटपर चला आता था; इस प्रकार मेरा मन किसी जगह स्थिर नहीं रहता था॥ २६॥
कदाचिच्चिन्तयन् ज्ञानं मानसे प्रतिभाति वै।<br>केऽमी पुत्राः क्व मोहोऽयं न श्राद्धार्हा मृतस्य मे॥ २७कभी-कभी मनमें ज्ञानका उदय हो जानेपर मैं सोचने लगता था कि ये पुत्र कौन हैं, यह मोह कैसा? मेरे मर जानेपर ये मेरा श्राद्ध भी तो नहीं कर सकेंगे॥ २७॥
व्यभिचारोद्भवाः किं मे सुखदाः स्युः सुताः किल।<br>माया बलवती मोहं वितनोति हि मानसे॥ २८दुराचारसे उत्पन्न ये पुत्र मुझे कौन-सा सुख देंगे। माया बड़ी प्रबल होती है; यह मनमें मोह पैदा कर देती है॥ २८॥
जानन्मोहान्धकूपेऽस्मिन्पतितोऽहं मृषा मुने।<br>इत्यकुर्वं रहस्तापं कदाचित्सुसमाहितः॥ २९हे मुने! कभी-कभी शान्तचित्त होकर एकान्तमें मैं यह सन्ताप करने लगता था कि मैं जान-बूझकर इस मोहरूपी अन्धकूपमें व्यर्थ ही गिर गया हूँ॥ २९॥
राज्यं प्राप ततः पाण्डुर्बलवान्भीष्मसम्मतः।<br>तदा मम मनो जातं प्रसन्नं सुतकारणात्॥ ३०भीष्मकी सम्मतिसे जब बलवान् पाण्डुको राज्य प्राप्त हुआ, उस समय मेरा मन इस बातसे बहुत प्रसन्न हुआ कि मेरा पुत्र राजसिंहासनपर बैठा है॥ ३०॥