भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 864, कुल 889 में से

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पृष्ठ 864

| अ० २६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८५५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मयापि न कृता तस्मिन्क्षमा तु भगिनीसुते।<br>सोऽपि शप्तोऽतिकोपाद्वै मा स्वर्गे ते गतिः किल॥ ३९तब मैंने भी अपने उस भगिनीपुत्र (भांजे) पर्वतको क्षमा नहीं किया। मैंने भी क्रोध करके उसे शाप दे दिया कि तुम भी अबसे स्वर्गके अधिकारी नहीं रहोगे॥ ३९॥
स्वल्पेऽपराधे यस्मान्मां शप्तवानसि पर्वत।<br>तस्मात्तवापि मन्दात्मन् मृत्युलोके स्थितिः किल॥ ४०हे मन्दात्मन् पर्वत! क्योंकि मेरे छोटे-से अपराधके लिये तुमने मुझे ऐसा शाप दिया है, अतएव तुम्हारा भी अब मृत्युलोकमें निवास होगा॥ ४०॥
पर्वतस्तु गतस्तस्मान्नगराद्विग्मना भृशम्।<br>अहं वानरवक्त्रस्तु सञ्जातस्तत्क्षणादपि॥ ४१इसके बाद पर्वतमुनि अत्यन्त उदास मनसे उस नगरसे निकल पड़े और मैं भी उसी समयसे बन्दरके मुखवाला हो गया॥ ४१॥
दृष्ट्वा मां वानरं क्रूरं राजपुत्री विलक्षणा।<br>विमनातीव सञ्जाता वीणाश्रवणलालसा॥ ४२वीणा सुननेकी उत्कट अभिलाषा रखनेवाली वह परम विलक्षण राजकुमारी मुझे भयंकर बन्दरके रूपमें देखकर अत्यन्त उदास मनवाली हो गयी॥ ४२॥
व्यास उवाच<br>ततः किमभवद् ब्रह्मन् कथं शापान्निवर्तितः।<br>मानुषास्यः पुनर्जातो भवान्ब्रूहि यथाविधि॥ ४३व्यासजी बोले— हे ब्रह्मन्! तत्पश्चात् क्या हुआ, आपको शापसे छुटकारा कैसे मिला तथा आप पुनः मानवकी मुखाकृतिवाले किस प्रकार हुए? ये सभी बातें भलीभाँति बताइये॥ ४३॥
पर्वतः क्व गतो भूयः सङ्गमो युवयोरभूत्।<br>कदा कुत्र कथं सर्वं विस्तरेण वदस्व ह॥ ४४पर्वतमुनि कहाँ चले गये? आप दोनोंका पुनर्मिलन कब, कहाँ और कैसे हुआ? यह सब विस्तारपूर्वक बताइये॥ ४४॥
नारद उवाच<br>किं ब्रवीमि महाभाग मायायाश्चरितं महत्।<br>दुःखितोऽहं भृशं तत्र पर्वते रुषिते गते॥ ४५नारदजी बोले— हे महाभाग! क्या कहूँ? मायाकी गति बड़ी विचित्र होती है। पर्वतमुनिके कुपित होकर चले जानेके पश्चात् मैं अत्यन्त दुःखित हो गया॥ ४५॥
पुनः सेवापरात्यर्थं राजपुत्री ममाभवत्।<br>गतेऽथ पर्वते कामं स्थितस्तत्रैव सद्मनि॥ ४६पर्वतमुनिके चले जानेपर मैं उसी भवनमें ठहरा रहा और वह राजकुमारी मेरी सेवामें पुनः तत्पर हो गयी॥ ४६॥
अहं दुःखान्वितो दीनस्तथा वानरवन्मुखः।<br>विशेषेण तु चित्तार्तः किं मे स्यादिति चिन्तयन्॥ ४७वानरके समान मुख हो जानेके कारण मैं दुःखी तथा उदास रहने लगा। अब मेरा क्या होगा? ऐसा सोच-सोचकर मैं विशेष चिन्तासे व्याकुल हो गया था॥ ४७॥
सञ्जयोऽथ सुतां दृष्ट्वा किञ्चित्प्रकटयौवनाम्।<br>विवाहार्थे राजसुतामपृच्छत्सचिवं तदा॥ ४८अपनी पुत्री राजकुमारी दमयन्तीको कुछ-कुछ प्रकट यौवनवाली देखकर उसके विवाहके सम्बन्धमें राजा संजयने मन्त्रीसे पूछा—
विवाहकालः सम्प्राप्तः सुताया मम साम्प्रतम्।<br>योग्यं वरं मम ब्रूहि राजपुत्रं सुसम्मतम्॥ ४९<br>रूपौदार्यगुणैर्युक्तं शूरं सुकुलसम्भवम्।अब मेरी पुत्रीका विवाह-योग्य समय हो गया है। अतएव योग्य वरके रूपमें कोई ऐसा राजकुमार आप मुझे बतलाइये, जो रूप-उदारता-गुण आदिसे सम्पन्न,
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