देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 884, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० ३० ] | षष्ठ स्कन्ध | ८७५ |
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| मृतं पितामहं स्वप्ने पश्यति स्वगृहागतम्।<br>संयोगस्तेन वार्ता च भोजनं सह मन्यते॥ ४३<br><br>प्रबुद्धः खलु जानाति स्वप्ने दृष्टं सुखासुखम्।<br>स्मृत्वा सर्वं जनेभ्यस्तु विस्तरात्प्रवदत्यपि॥ ४४<br><br>स्वप्ने कोऽपि न जानाति भ्रमोऽयमिति निश्चयः।<br>तथा तथैव विभवो मायाया दुर्गमः किल॥ ४५<br><br>नाहं नारद जानामि पारं परमदुर्घटम्।<br>गुणानां किल मायाया नैव शम्भुर्न पद्मजः॥ ४६<br><br>कोऽन्यो ज्ञातुं समर्थोऽभून्मानतो मन्दधीः पुनः।<br>मायागुणपरिज्ञानं न कस्यापि भवेदिह॥ ४७ | कभी-कभी प्राणी स्वप्नमें अपने मृत पितामहको घरपर आया हुआ देखता है। वह समझता है कि मैं उनके साथ मिल रहा हूँ, बात कर रहा हूँ, भोजन कर रहा हूँ। जागनेपर वह समझ जाता है कि सुख-दुःख-सम्बन्धी ये बातें मैंने स्वप्नमें देखी हैं। उन बातोंको याद करके वह लोगोंको विस्तारपूर्वक उनके बारेमें बताता भी है। जिस प्रकार कोई भी प्राणी स्वप्नमें यह नहीं जान पाता कि यह निश्चय ही भ्रम है, उसी प्रकार मायाका ऐश्वर्य जान पाना अत्यन्त कठिन है। हे नारद! मायाके गुणोंकी अगम्य सीमाको न तो मैं जानता हूँ और न तो शिव तथा न ब्रह्मा ही जानते हैं तो फिर मन्दबुद्धिवाला दूसरा कौन मनुष्य उसे पूर्णतः जाननेमें समर्थ हो सकता है? इस जगत्का कोई भी प्राणी मायाके गुणोंको नहीं जान सका है॥ ४३-४७॥ | | गुणत्रयकृतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>विना गुणैर्न संसारो वर्तते किञ्चिदप्यदः॥ ४८<br><br>अहं सत्त्वप्रधानोऽस्मि रजस्तमसमन्वितः।<br>न कदाचित्त्रिभिर्हीनो भवामि भुवनेश्वरः॥ ४९<br><br>तथा ब्रह्मा पिता तेऽत्र रजोमुख्यः प्रकीर्तितः।<br>तमःसत्त्वसमायुक्तो न ताभ्यामुज्झितः किल॥ ५०<br><br>शिवस्तथा तमोमुख्यो रजःसत्त्वसमावृतः।<br>गुणत्रयविहीनस्तु नैव कोऽपि मया श्रुतः॥ ५१ | यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके संयोगसे विरचित है। इन गुणोंके बिना यह संसार क्षणभर भी स्थित नहीं रह सकता। मैं सत्त्वगुणप्रधान हूँ; रजोगुण और तमोगुण मुझमें गौणरूपमें विद्यमान हैं। तीनों गुणोंसे रहित होनेपर मैं अखिल भुवनका नियन्ता कभी नहीं हो सकता। उसी प्रकार आपके पिता ब्रह्मा रजोगुणप्रधान कहे जाते हैं। वे सत्त्वगुण तथा तमोगुणसे भी युक्त हैं; इन दोनों गुणोंसे रहित नहीं हैं। उसी प्रकार भगवान् शंकर भी तमोगुणप्रधान हैं तथा सत्त्वगुण और रजोगुण उनमें गौणरूपसे विद्यमान हैं। मैंने ऐसे किसी प्राणीके विषयमें नहीं सुना है, जो इन तीनों गुणोंसे रहित हो॥ ४८-५१॥ | | तस्मान्मोहो न कर्तव्यः संसारेऽस्मिन्मुनीश्वर।<br>मायाविनिर्मितेऽसारेऽपारे परमदुर्धटे॥ ५२<br><br>दृष्टा माया त्वयाद्यैव भुक्ता भोगा ह्यनेकशः।<br>किं पृच्छसि महाभाग तस्याश्चरितमद्भुतम्॥ ५३ | अतएव हे मुनीश्वर! मायाके द्वारा विरचित, सारहीन, सीमारहित तथा परम दुर्घट इस संसारमें प्राणीको मोह नहीं करना चाहिये। आपने अभी-अभी मायाका प्रभाव देखा है; आपने अनेक प्रकारके भोगोंका उपभोग किया। तब हे महाभाग! आप उस महामायाके अद्भुत चरित्रके विषयमें मुझसे क्यों पूछ रहे हैं?॥ ५२-५३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे मायाप्राबल्यवर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥ $\sim\sim\sim\circ\sim\sim\sim$