भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| अ० ३१ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८७७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्त्रीभावं गमितः कामं वर्षाणि सुबहून्यपि।<br>अनुभूतं महद्दुःखं पुत्रशोकसमुद्भवम्॥ १३मैं स्त्रीशरीर धारण किये रहा और मैंने पुत्रशोकजनित भीषण दुःखका अनुभव किया॥ ११—१३॥
प्रबोधितोऽहं तेनैव मृदुवाक्यामृतेन च।<br>पुनः सरोवरे स्नात्वा जातोऽहं नारदः पुमान्॥ १४तत्पश्चात् उन्होंने ही अपने अमृतमय मधुर वचनसे मुझे समझाया और पुनः सरोवरमें स्नान करके मैं पुरुषरूप नारद हो गया॥ १४॥
किमेतत्कारणं ब्रह्मन् यन्मोहमगमं तदा।<br>विस्मृतं पूर्वविज्ञानं तन्मयस्तरसो कृतः॥ १५<br><br>एतन्मायाबलं ब्रह्मन्न जानेऽहं दुरत्ययम्।<br>ज्ञानहानिकरं जातं मूलं मोहस्य विस्फुटम्॥ १६हे ब्रह्मन्! उस समय मुझे जो मोह हो गया था, उसका क्या कारण है? उस समय मेरा पूर्वज्ञान विस्मृत हो गया था और मैं शीघ्र ही उन [राजा तालध्वज]-में पूर्णरूपसे अनुरक्त हो गया। हे ब्रह्मन्! मैं मायाके इस बलको दुर्लङ्घ्य, ज्ञानकी हानि करनेवाला तथा मोहकी विस्तृत जड़ मानता हूँ॥ १६॥
अनुभूतं मया सम्यग्ज्ञातं सर्वं शुभाशुभम्।<br>कथं त्वं जितवांस्तात तमुपायं वदस्व मे॥ १७मैंने सम्पूर्ण शुभ तथा अशुभ परिस्थितियोंका अनुभव किया तथा सम्यक् प्रकारसे उनके विषयमें जाना। हे तात! आपने उस मायाको कैसे जीता है? वह उपाय मुझे भी बताइये॥ १७॥
नारद उवाच<br>विज्ञाप्तोऽसौ मया धाता प्रीतिपूर्वमतः परम्।<br>मामुवाच स्मितं कृत्वा पिता मे वासवीसुत॥ १८नारदजी बोले— हे व्यासजी! पिता ब्रह्माजीसे मेरे इस प्रकार बतानेपर वे मुसकराकर मुझसे प्रेमपूर्वक कहने लगे॥ १८॥
ब्रह्मोवाच<br>दुर्जयेषा सुरैः सर्वैर्मुनिभिश्च महात्मभिः।<br>तापसैर्ज्ञानयुक्तैश्च योगिभिः पवनाशनैः॥ १९ब्रह्माजी बोले— सभी देवता, मुनि, महात्मा, तपस्वी, ज्ञानी तथा वायुसेवन करनेवाले योगियोंके लिये भी यह माया कठिनतासे जीती जानेवाली है॥ १९॥
नाहं तां सर्वथा ज्ञातुं शक्तो मायां महाबलाम्।<br>विष्णुर्ज्ञातुं न शक्तश्च तथा शम्भुरुमापतिः॥ २०उस महाशक्तिशालिनी मायाको सम्यक् प्रकारसे जाननेमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। उसी प्रकार विष्णु तथा उमापति शंकर भी उसे जाननेमें समर्थ नहीं हैं॥ २०॥
दुर्ज्ञेया सा महामाया सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी।<br>कालकर्मस्वभावाद्यैर्निमित्तकारणैर्वृता ॥ २१सृजन, पालन तथा संहार करनेवाली वह महामाया सभीके लिये दुर्ज्ञेय है। काल, कर्म तथा स्वभाव आदि निमित्त कारणोंसे वह सदा समन्वित है॥ २१॥
शोकं मा कुरु मेधाविंस्तत्र मायामहाबले।<br>न चैव विस्मयः कार्यो वयं सर्वे विमोहिताः॥ २२हे मेधाविन्! अपरिमित बलसे सम्पन्न इस मायाके विषयमें आप शोक न करें। इसके विषयमें किसी प्रकारका विस्मय नहीं करना चाहिये। हमलोग भी मायासे विमोहित हैं॥ २२॥
नारद उवाच<br>पित्रत्युक्तस्तदा व्यास तमापृच्छ्य गतस्मयः।<br>आगतोऽस्म्यत्र पश्यन्वै तीर्थानि च वराणि च॥ २३नारदजी बोले— हे व्यासजी! पिताजीके ऐसा कहनेपर मेरा विस्मय दूर हो गया। इसके बाद उनसे आज्ञा लेकर उत्तम तीर्थोंका दर्शन करता हुआ मैं यहाँ आ पहुँचा हूँ॥ २३॥
तस्मात्त्वमपि सन्त्यज्य मोहं कौरवनाशजम्।<br>कालक्षयं सुखासीनः स्थानेऽस्मिन् कुरु सत्तम॥ २४अतएव हे श्रेष्ठ व्यासजी! कौरवोंके नाशसे उत्पन्न मोहका परित्याग करके आप भी इस स्थानपर सुखपूर्वक रहते हुए समय व्यतीत कीजिये॥ २४॥