भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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१५।५ ] सुखवग्गो [ ९१ अनुवाद—वैरियोंके प्रति ( भी ) अवैरी हो, अहो ! हम ( कैसा ) सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; वैरी मनुष्योंके बीच अवैरी होकर हम विहार करते हैं। भयभीत मनुष्योंमें अभय हो, अहो ! हम सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; भयभीत मनुष्यों के बीच निर्भय होकर हम विहार करते हैं । उत्सुकौं (=आसक्तों) में उत्सुकता-रहित हो० । पंचसाला ( ब्राह्मणग्राम, मगध ) मार - २००-सुसुखं वत ! जीवाम येसं नो नत्थि किञ्चनं । पीतिमक्खा भविस्साम देवा आभस्सरा यथा ॥४॥ ( सुसुखं वत ! जीवामो येषां नो नास्ति किंचन । प्रीतिभक्ष्या भविष्यामो देवा आभास्वरा यथा ॥४॥ ) अनुवाद—जिन हम ( लोगों ) के पास कुछ नहीं, अहो ! वह हम कितना सुखसे जीवन बिता रहे हैं। हम आभास्वर देवताओं की भाँति प्रीतिभक्ष्य (=प्रीति ही भोजन है जिनका ) हैं । जेतवन कोसलराज २०१-जयं वेरं पसवति दुक्खं सेति पराजितो । उपसन्तो सुखं सेति हित्वा जयपराजयं ॥५॥ ( जयो वैरं प्रसूते दुःखं शेते पराजितः । उपशान्तः सुखं शेते हित्वा जयपराजयौ ॥५॥ ) अनुवाद—विजय वैरको उत्पन्न करती है, पराजित ( पुरुष ) दुःखकी ( नींद ) सोता है; ( राग आदि दोष जिसके ) शान्त ( हैं,