धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
DevanagariHindipublished213 पृष्ठ
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१०० ] धम्मपदं [ १६।१२ ( चिरप्रवासिनं पुरुषं दूरतो स्वस्त्यागतम् । ज्ञातिमित्राणि सुहृदश्चाऽभिनन्दन्त्यागतम् ॥११॥ ) २२०--तथेव कतपुञ्ञम्पि अस्मा लोका परं गतं । पुञ्ञानि पतिगण्हन्ति पियं ञातीव आगतं ॥१२॥ ( तथैव कृतपुण्यमप्यस्मात् लोकात् परं गतम् । पुण्यानि प्रतिगृह्णन्ति प्रियं ज्ञातिमिवागतम् ॥१२॥ ) अनुवाद--चिर-प्रवासी (=चिर काल तक परदेशमें रहे) दूर (देश) से सानन्द लौटे पुरुषका, जातिवाले, मित्र और सुहृद् अभि- नन्दन करते हैं; इसी प्रकार पुण्यकर्मा (पुरुष) को इस लोकसे पर(लोक) में जानेपर, (उसके) पुण्य (कर्म) प्रिय जाति(वालों) की भाँति स्वीकार करते हैं। १६-प्रियवर्ग समाप्त