धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ ] धम्मपदं [ १९।५ जेतवन वज्जिय ( भिक्खु ) २५८–न तेन पण्डितो होति यावता बहु भासति । खेमी अवेरी अभयो पण्डितो'ति पवुच्चति ॥३॥ ( न तावता पंडितो भवति यावता बहु भाषते । क्षेमी अवैरी अभयः पंडित इत्युच्यते ॥३॥ ) 'अनुवाद—बहुत भाषण करनेसे पंडित नहीं होता । जो क्षेमवान् अवैरी और अभय होता है, वही पंडित कहा जाता है । जेतवन एकुद्दान ( थेर ) २५६–न तावता धम्मधरो यावता बहु भासति । यो च अप्पम्पि सुत्वान धम्मं कायेन पस्सति । स वे धम्मधरो होति यो धम्मं नप्पमज्जति ॥४॥ ( न तावता धर्मधरो यावता बहु भाषते । यश्चाल्पमपि श्रुत्वा धर्मं कायेन पश्यति । स वै धर्मधरो भवति यो धर्मं न प्रमाद्यति ॥४॥ ) अनुवाद—बहुत बोलनेसे धर्मधर (=धार्मिक ग्रंथोका ज्ञाता ) नहीं होता, जो थोड़ा भी सुनकर शरीरसे धर्मका आचरण करता है, और जो धर्ममें असावधानी (=प्रमाद ) नहीं करता, वही धर्मधर है । जेतवन लकुण्टक भदिय ( थेर ) २६०–न तेन थेरो होति येन'स्स पलितं सिरो । परिपक्को वयो तस्स मोघजिण्णो'ति वुच्चति ॥५॥