धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०।१४ ] मग्गवग्गो [ १२७ अनुवाद—वनको काटो, वृक्षको मत, वनसे भय उत्पन्न होता है, भिक्षुओ ! वन और झाड़ीको काटकर निर्वाणको प्राप्त हो जाओ । जबतक अणुमात्र भी स्त्रीमें पुरुषकी कामना अखंडित रहती है, तबतक दूध पीनेवाला बछडा जैसे मातामें आसक्त रहता है, ( वैसे ही वह पुरुष बंधा रहता है ) । जेतवन सुवण्णकार (थेर) २८५-उच्छिन्द सिनेहमत्तनो कुमुदं सारदिकं 'व पाणिना । सन्तिमग्गमेव ब्रूहय निब्बानं सुगतेन देसितं ॥१३॥ ( उच्छिन्धि स्नेहमात्मनः कुमुदं शारदिकमिव पाणिना । शान्तिमार्गमेव बृंहय निर्वाणं सुगतेन देशितम् ॥१३॥ ) अनुवाद —हाथसे शरद्(ऋतु)के कुमुदकी भाँति, आत्मस्नेहको उच्छिन्न कर डालो, सुगत (=बुद्ध )द्वारा उपदिष्ट (इस ) शान्तिमार्ग निर्वाणका आश्रय लो । जेतवन (महाधनी वणिक् ) २८६-इध वस्सं वसिस्सामि इध हेमन्तगिम्हेसु । इति बालो विचिन्तेति अन्तरायं न बुज्झति ॥१४॥ ( इह वर्षासु वसिष्यामि इह हेमन्तग्रीष्मयोः । इति बालो विचिन्तयति, अन्तरायं न बुध्यते ॥१४॥ ) अनुवाद—यहाँ वर्षांमें बसूँगा, यहाँ हेमन्त और ग्रीष्ममें (बसूँगा) —मूढ इस प्रकार सोचता है, (और ) अन्तराय (=विघ्न ) को नहीं बूझता ।