भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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२१७ ] पकिण्णकवग्गो [ १३१ जेतवन लकुण्टक भद्दिय ( थेर ) २६४-मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च खत्तिये । रट्ठं सानुचरं हन्त्वा अनिघो याति ब्राह्मणो ॥५॥ ( मातरं पितरं हत्वा राजानौ द्वौ च क्षत्रियौ । राष्ट्रं साऽनुचरं हत्वाऽनघो याति ब्राह्मणः ॥५॥ ) अनुवाद—माता (=तृष्णा ), पिता (=अहंकार ), दो क्षत्रिय राजाओं [=(१) आत्मा, ब्रह्म प्रकृति आदिकी नित्यताका सिद्धान्त, (२) मरणान्त जीवन मानना या जड़वाद ], अनुचर(=राग )सहित राष्ट्र (=रूप, विज्ञान आदि संसारके उपादान पदार्थ ) को मार कर ब्राह्मण (=ज्ञानी ) निष्पाप होता है । २६५-मातरं पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च सोत्थिये । वेय्यग्धपञ्चमं हन्त्वा अनिघो याति ब्राह्मणो ॥६॥ ( मातरं पितरं हत्वा राजानौ द्वौ च श्रोत्रियौ । व्याघ्रपंचमं हत्वाऽनघो याति ब्राह्मणः ॥६॥ ) अनुवाद—माता, पिता, दो श्रोत्रिय राजाओं [=(१) नित्यतावाद, (२) जड़वाद ] और पाँचवें व्याघ्र (=पाँच ज्ञानके आवरणों )को मारकर, ब्राह्मण निष्पाप हो जाता है । राजगृह ( वेणुवन ) ( दारुसाकटिकपुत्त ) २६६-सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति सदा गोतमसावका । येसं दिवा च रत्तो च निच्चं बुद्धगता सति ॥७॥