भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

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२१।१४ ] पकिण्णकवग्गो [ १३३ ३०१-सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति सदा गोतमसावका । येसं दिवा च रत्तो च भावनाय रतो मनो ॥१२॥ ( सुप्रबुद्धं० । ० भावनायां रतं मनः ॥१२॥ ) अनुवाद-जिनको दिन-रात कायविषयक स्मृति बनी रहती है० । जिनका मन दिन-रात अहिंसामें रत रहता है० । जिनका मन दिन-रात भावना (=चिंत ) में रत रहता है० । वैशाली ( महावन ) वज्जिपुत्तक ( भिक्खु ) ३०२-दुप्पब्बज्जं दुरभिरमं दुरावासा घरा दुखा । दुक्खोऽसमानसंवासो दुक्खानुपतितद्धगू । तस्मा न च अद्धगू सिया न च दुक्खानुपतितो सिया ॥ १३ ॥ ( दुष्प्रव्रज्यां दुरभिरमं दुरावासं गृहं दुःखम् । दुःखोऽसमानसंवासो दुःखानुपाततोऽध्वगः । तस्मान्न चाऽध्वगः स्यान्न च दुःखानुपातितः स्यात् ॥१३॥) अनुवाद-कष्टपूर्ण प्रव्रज्या ( = संन्यास ) में रत होना दुष्कर है, न रहने योग्य घर दुःखद है, अपमानके साथ बसना दुःखद है, मार्गका बटोही होना दुःखद है, इसलिये मार्गका बटोही न बने, न दुःखमें पतित होवे । जेतवन चित्त ( गृहपति ) ३०३-सद्धो सीलेन सम्पन्नो यसोभोगसमप्पितो । यं यं पदेसं भजति तत्थ तत्थेव पूजितो ॥१४॥