धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२।७ ] निरयवग्गो [ १३७ राजा च दण्डं गरुकं पणेति तस्मा नरो परदारं न सेवे ॥५॥ (अपुण्यलाभश्च गतिश्च पापिका, भीतस्य भीतया रतिश्च स्तोकिका। राजा च दंडं गुरुकं प्रणयति तस्मात् नरो परदारान् न सेवेत ॥ ५ ॥) अनुवाद—प्रमादी परस्त्रीगामी मनुष्यकी चार गतियाँ हैं—अपुण्य- का लाभ, सुखसे न निद्रा, तीसरे निन्दा, और चौथे नरक। (अथवा) अपुण्यलाभ, बुरी गति, भयभीत (पुरुष) की, भयभीत (स्त्री) से अत्यल्प रति, और राजाका भारी दंड देना, इसलिये मनुष्यको परस्त्रीगमन न करना चाहिये। जेतवन कठमाषी (भिक्षु) ३११–कुसो यथा दुग्गहीतो हत्थमेवानुकन्तति । सामञ्ञं दुप्परामट्ठं निरयायुपकड्ढति ॥६॥ (कुशो यथा दुर्गृहीतो हस्तमेवाऽनुकृन्तति । श्रामण्यं दुष्परामृष्टं निरयायोपकर्षति ॥ ६ ॥) अनुवाद—जैसे ठीकसे न पकडनेसे कुश हाथको ही छेदता है, (इसी प्रकार) श्रमणपन (=संन्यास) ठीकसे ग्रहण न करनेपर नरकमें ले जाता है। ३१२-यं किञ्चि सिथिलं कम्मं सङ्किलिट्ठं च यं वतं । सङ्कस्सरं ब्रह्मचरियं न तं होति महप्फलं ॥७॥