धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५।५ ] भिक्खुवग्गो [ १६१ अनुवाद—कायाका संवर (=संयम ) ठीक है, ठीक है वचनका संवर; मनका संवर ठीक है, ठीक है सर्वत्र (इन्द्रियों)का संवर; सर्वत्र संवर-युक्त भिक्षु सारे दुःखोंसे छूट जाता है । जेतवन हंसघातक (भिक्षु) ३६२—हत्थसञ्ञतो पादसञ्ञतो वाचाय सञ्ञतो सञ्ञतुत्तमो । अज्झत्तरतो समाहितो एको सन्तुसितो तमाहु भिक्खू ॥३॥ (हस्तसंयतः पादसंयतो वाचा संयतः संयतोत्तमः । अध्यात्मरतः समाहित एकः सन्तुष्टस्तमाहुर्भिक्षुम् ॥३॥) अनुवाद—जिसके हाथ, पैर और वचनमें संयम है, (जो) उत्तम संयमी है, जो घटके भीतर (=अध्यात्म) रत, समाधियुक्त, अकेला (और) सन्तुष्ट है, उसे भिक्षु कहते हैं । जेतवन कोकालिक ३६३—यो मुखसञ्ञतो भिक्खू मन्तभाणी अनुद्धतो । अत्थं धम्मञ्च दीपेति मधुरं तस्स भासितं ॥४॥ (यो मुखसंयतो भिक्षुर्मंत्रमाणी, अनुद्धतः । अर्थं धर्मं च दीपयति मधुरं तस्य भाषितम् ॥४॥) अनुवाद—जो मुखमें संयम रखता है, मनन करके बोलता है, उद्धत नहीं है, अर्थ और धर्मको प्रकट करता है, उसका भाषण मधुर होता है । जेतवन धम्माराम (थेर) ३६४—धम्मारामो धम्मरतो धम्मं अनुविचिन्तयं । धम्मं अनुस्सरं भिक्खू सद्धम्मा न परिहायति ॥५॥ ११