धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 175, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें१६३ ] धम्मपदं [ २५।१२ अनुवाद—हे भिक्षु ! इस नावको उलीचो, उलीचने पर (यह) तुम्हारे लिये हल्की हो जायेगी। राग और द्वेषको छेदनकर, फिर तुम निर्वाणको प्राप्त होगे। ३७०—पंच छिन्दे पञ्च जहे पञ्चवुत्तरि भावये । पञ्च सङ्गातिगो भिक्खू ओघतिण्णो'ति वुच्चति ॥ ११॥ (पंच छिन्धि पंच जहीहि पंचोत्तरं भावय। पंचसंगाऽतिगो भिक्षुः, 'ओघतीर्ण' इत्युच्यते ॥११॥) अनुवाद—(जो रूप, राग, मान, उद्धतपना और अविद्या इन) पाँचको छेदन करे, (जो नित्य आत्माकी कल्पना, सन्देह, शील-व्रत पर अधिक जोर, भोगोंमें राग, और प्रतिहिंसा इन) पाँचको त्याग करे; उपरान्त (जो श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा) इन पाँचकी भावना करे; (जो, राग, द्वेष, मोह, मान, और झूठी धारणा इन) पाँचके संसर्गको अतिक्रमण कर चुका है; (वह काम, भव दृष्टि और अविद्यारूपी) ओघो (=बाढ़ों) से उत्तीर्ण हुआ कहा जाता है। ३७१—झाय भिक्खू ! मा च पामदो मा ते कामगुणे भमस्सु चित्तं । मा लोहगुळं गिली पमत्तो मा कंदी दुक्खमिदन्ति डय्हमानो ॥१२॥ (ध्याय भिक्षो ! मा च प्रमादः, मा ते कामगुणे भ्रमतु चित्तम् ।