भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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१६६ ] धम्मपदं [ २५।१७ ( यतो यतः संमृशति स्कन्धानां उदयव्ययम् । लभते प्रीतिप्रामोद्यं अमृतं तद् विजानताम् ॥ १५ ॥) अनुवाद—( पुरुष ) जैसे जैसे ( रूप, वेदना, संज्ञा, सस्कार, विज्ञान इन ) पाँच स्कन्धोंकी उत्पत्ति और विनाश पर विचार करता है, ( वैसे ही वैसे, वह ) ज्ञानियोंकी प्रीति और प्रमोद ( रूपी ) अमृतको प्राप्त करता है । ३७५–तत्रायमादि भवति इध पञ्ञस्स भिक्खुनो । इन्द्रियगुत्ती सन्तुट्ठी पातिमोक्खे च संवरो । मित्ते भजस्सु कल्याणे सुद्धाजीवे अतन्दिते ॥१६॥ ( तत्राऽयमादिर्भवतीह प्राज्ञस्य भिक्षोः । इन्द्रियगुप्तिः सन्तुष्टिः प्रातिमोक्षे च संवरः । मित्राणि भजस्व कल्याणानि शुद्धाजीवान्यतन्द्रितानि ॥१६॥) अनुवाद—यहाँ प्राज्ञ भिक्षुको आदि( में करना ) है—इन्द्रिय- संयम, सन्तोष और प्रातिमोक्ष(=भिक्षुओंके आचार )की रक्षा । ( वह, इसके लिये ) निरालस, शुद्ध जीविकावाले, अच्छे मित्रोंका सेवन करे । ३७६–पटिसन्थारवुत्तस्स आचारकुसलो सिया । ततो पामोज्जबहुलो दुक्खस्सन्तं करिस्सति ॥ १७॥ ( प्रतिसंस्तारवृत्तस्याऽऽचारकुशलः स्यात् । ततः प्रामोद्यबहुलो दुःखस्याऽन्तं करिष्यति ॥१७॥) अनुवाद—जो प्रेम सत्कार स्वभाववाला तथा आचार( शास्त्र)में निपुण है, वह सानन्द दुःखका अन्त करेगा ।