भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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१६८ ] धम्मपदं [ २५।२३ अनुवाद—(जो) अपने ही आपको प्रेरित करेगा, अपने ही आपको संलग्न करेगा; वह आत्म-गुप्त (=अपने द्वारा रक्षित) स्मृति-संयुक्त भिक्षु सुखसे विहार करेगा ! ३८०—अत्ता हि अत्तनो नाथो अत्ता हि अत्तनो गति । ’ तस्मा सञ्ञममत्तानं अस्सं भद्रं'व वाणिजो ॥२१॥ (आत्मा ह्यात्मनो नाथ आत्मा ह्यात्मनो गतिः । तस्मात् संयमयात्मानं अश्वं भद्रमिव वणिक् ॥२१॥ अनुवाद—(मनुष्य) अपने ही अपना स्वामी है, अपने ही अपनी गति है; इसलिये अपनेको संयमी बनावे, जैसे कि सुन्दर घोड़ेको बनिया (संयत करता है) । राजगृह (वेणुवन) वक्कलि (थेर) ३८१—पामोज्जबहुलो भिक्खू पसन्नो बुद्धसासने । अधिगच्छे पदं सन्तं सङ्खारूपसमं सुखं ॥२२॥ (प्रामोद्यबहुलो भिक्षुः प्रसन्नो बुद्धशासने । अधिगच्छेत् पदं शान्तं संस्कारोपशमं सुखम् ॥२२॥ अनुवाद—बुद्धके उपदेशमें प्रसन्न बहुत प्रमोद्युक्त भिक्षु संस्कारोंको उपशमन करनेवाले सुखमय शान्त पदको प्राप्त करता है। श्रावस्ती (पूर्वाराम) सुमन (सामनेर) ३८२—यो ह वे दहरो भिक्खू युञ्जते । बुद्धसासने । सो इमं लोकं पभासेति अब्भा मुत्तो 'व चन्दिमा ॥२३॥