धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ ] धम्मपदं [ २६।६ श्रावस्ती ( पूर्वाराम ) आनन्द ( थेर ) ३८७-दिवा तपति आदिच्चो रत्तिं आभाति चन्दिमा । सन्नद्धो खत्तियो तपति झायी तपति ब्राह्मणो । अथ सब्बमहोरत्तिं बुद्धो तपति तेजसा ॥५॥ ( दिवा तपत्यादित्यो रात्रावाभाति चन्द्रमा । सन्नद्धः क्षत्रियस्तपति ध्यायी तपति ब्राह्मणः । अथ सर्वमहोरात्रं बुद्धस्तपति तेजसा ॥५॥ ) अनुवाद—दिनमें सूर्य तपता है, रातको चन्द्रमा प्रकाशता है, कवचबद्ध ( होनेपर ) क्षत्रिय तपता है, ध्यानी ( होनेपर ) ब्राह्मण तपता है, और बुद्ध रात-दिन ( अपने ) तेजसे सब- ( से अधिक ) तपता है । जेतवन ( कोई प्रव्रजित ) ३८८-वाहितपापो 'ति ब्राह्मणो समचरिया समणो'ति वुच्चति । पब्बाजयमत्तनो मलं तस्मा पब्बजितो'ति वुच्चति ॥६॥ ( वाहितपाप इति ब्राह्मणः समचर्य्यः श्रमण इत्युच्यते । प्राब्राजयन्नाऽऽत्मनो मलं तस्मात् प्रव्रजित इत्युच्यते ॥६॥ ) अनुवाद—जिसने पापको ( धोकर ) बहा दिया वह ब्राह्मण है, जो समताका आचरण करता है, वह समण (=श्रमण= संन्यासी ) है, ( चूँकि ) उसने अपने ( चित्त-) मलोको हटा दिया, इसीलिये वह प्रव्रजित कहा जाता है।