धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें२६।१७ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७७ भय नहीं खाता, जो संग और आसक्तिसे विरत है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन ( दो ब्राह्मण ) ३९८-छेत्वा नन्दिं वरत्तञ्च सन्दानं सहनुक्कमं । उक्खित्तपलिघं बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥१६॥ ( छित्त्वा नन्दिं वरत्रां च सन्दानं सहनुक्रमम् । उत्क्षिप्तपरिघं बुद्धं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥१६॥ ) अनुवाद-नन्दी (=क्रोध), वरत्रा (=तृष्णा रूपी रस्सी), सन्दान (=६२ प्रकारके मतवादरूपी पगहे), और हनुक्रम (=मुँहपर बाँधनेके जावे)को काट एवं परिघ (=जूए)को फेंक जो बुद्ध (=ज्ञानी) हुआ, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । ` राजगृह (वेणुवन) ' ( अक्कोस) भारद्वाज ३९९-अक्कोसं वधबन्धञ्च अदुट्ठो यो तितिक्खति । खन्तिबलं बलानीकं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥१७॥ ( अक्रोशन् वध-बंधं च अदुष्टो यस्तितिक्षति । क्षान्तिबल बलानीकं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥१७॥ ) अनुवाद-जो विना दूषित (चित्त) किये गाली, वध और बंधनको सहन करता है, क्षमा बलही जिसके बल(=सेना) का सेनापति है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । १२