भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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२६।२३ ] ब्राह्मणवग्गो [ १७९ जान लेता है, जिसने अपने बोझको उतार फेंका, और जो आसक्तिरहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । राजगृह ( गृध्रकूट ) खेमा ( भिक्षुणी ) ४०३-गम्भीरपञ्ञं मेधाविं मग्गामग्गस्स कोविदं । उत्तमत्थं अनुप्पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२१॥ ( गंभीरप्रज्ञं मेधाविनं मार्गामार्गस्य कोविदम् । उत्तमार्थमनुप्राप्तं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२१॥ अनुवाद-जो गम्भीर प्रज्ञावाला, मेधावी, मार्ग-अमार्गका ज्ञाता, उत्तम पदार्थ (=सत्य) को पाये है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन ( पब्भारवासी ) तिस्स ( थेर ) ४०४-असंसट्ठं गहट्ठेहि अनागारेहि चूभयं । अनोकसारिं अप्पिच्छं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२२॥ ( असंसृष्टं गृहस्थैः, अनागारैश्चोभाभ्याम् । अनोकःसारिणं अल्पेच्छं तमहं ब्रवीमि ब्राह्मणम् ॥२२॥ अनुवाद-घरवाले (=गृहस्थ ) और बेघरवाले दोनों हीमें जो लिप्त नहीं होता, जो बिना ठिकानेके घूमता तथा बेचाह है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ । जेतवन ( कोई भिक्षु ) ४०५-निधाय दण्डं भूतेसु तसेसु थावरेसु च । यो न हन्ति न घातेति तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ॥२३॥