भारतकोश
धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 213 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 81

७० ] धम्मपद [ ११।१० अनुवाद—अल्पश्रुत (=अज्ञानी) पुरुष बैलकी भाँति जीर्ण होता है। उसका मांस ही बढ़ता है, प्रज्ञा नहीं बढ़ती। १५३-अनेकजातिसंसारं सन्धाविस्सं अनिब्बिसं । गहकारकं गवेसन्तो दुक्खा जाति पुनप्पुनं ॥८॥ (अनेकजातिसंसारं समधाविषं अनिर्विशमानः । गृहकारकं गवेषयन्, दुःखा जातिः पुनः पुनः ॥८॥) १५४-गहकारक ! दिट्ठोसि पुन गेहं न काहसि । सब्बा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसङ्घितं । विसङ्खारगतं चित्तं तण्हानं खयमन्झगा ॥६॥ (गृहकारक, दृष्टोऽसि पुनर्गेहं न करिष्यसि । सर्वास्ते पार्श्विका भग्ना गृहकूटं विसंस्कृतम् । विसंस्कारगतं चित्तं तृष्णानां क्षयमभ्यगात् ॥६॥) अनुवाद—बिना रुके अनेक जन्मों तक संसारमें दौड़ता रहा। (इस काया रूपी) कोठरीको बनानेवाले (=गृहकारक) को खोजते पुनः पुनः दुःख (-मय) जन्म में पड़ता रहा। हे गृह- कारक ! (अब) तुझे पहिचान लिया, (अब) फिर तू घर नहीं बना सकेगा। तेरी सभी कड़ियाँ भग्न हो गयीं, गृहका शिखर भी निर्बल हो गया। संस्कार-रहित चित्तसे तृष्णाका क्षय हो गया। बाराणसी (ऋषिपत्तन) महाधनी सेठका पुत्र १५५-अचरित्वा ब्रह्मचरियं अलद्धा योब्बने धनं । जिण्णकोञ्चा'व झायन्ति खीशमच्छे'व पल्लले ॥१०॥

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 81, कुल 213 में से · BharatKosha