धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ॥. ) ३. स्वामी सत्यदेव परिव्राजक हिन्दी ( बुद्धगीता ) ४. श्री विष्णुनारायण हिन्दी ( सं० १९८५ ) ५. पं० गंगा प्रसाद उपाध्याय पाली-हिन्दी ( १९३२ ई० ) पाँच अनुवादोंके होते छठेंकी क्या आवश्यकता ?—इसका उत्तर आप पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी और महाबोधिसभाके मंत्री ब्रह्मचारी देवप्रियसे पूछिये । मैंने बहुत ननु-नच किया किन्तु उन्होंने एक नहीं सुनी । ६ फरवरीसे ८ मार्च तक मैं सुल्तानगंज ( भागलपुर )में “गंगा”के पुरातत्त्वांकके सम्पादनके लिये श्री धूपनाथ सिंहका अतिथि था । सम्पादनका काम ही कम न था, उसपरसे वहाँ रहते दो लेख भी लिखने पड़े । उसी समय इस अनुवाद में भी हाथ लगा दिया । जो अंश बाकी रह गया था, उसे किताब को प्रेसमें देनेके बाद समाप्त किया । इस तरह "बुद्धचर्या"की भाँति "धम्मपद"में भी जल्दीसे काम लिया गया है । इससे पुस्तकमें प्रूफ़ही- की गलतियाँ नहीं रहगईं, बल्कि जल्दीमें किये अनुवादको पुनरावृत्ति न करनेसे अनुवादकी भाषाको और सरल नहीं बनाया जा सका, इन त्रुटियोंका मैं स्वयं दोषी हूँ । ग्रंथमें पहिले बारीक टाइपमें बाईं ओर उस स्थानका नाम दिया है, जहाँ पर उक्त गाथा बुद्धके मुखसे निकली; दाहिनी ओर उस व्यक्तिका नाम है, जिसके प्रति या विषयमें उक्त गाथा कही गई । धम्मपदकी अट्ठकथा (=टीका )में हर एक गाथाका इतिहास भी दिया हुआ है; संक्षिप्त करके उसे देनेका विचार तो उठा, लेकिन समयाभाव और ग्रंथविस्तारके भयसे वैसा नहीं किया जा सका । सुत्तपिटकके प्राय १०० सूत्र, और विनयके कुछ अंशको मैंने अपनी बुद्धचर्यामें अनुवादित किया है । भारतीय भाषाओंमें पाली ग्रंथोंका सबसे अधिक अनुवाद बगलामें हुआ है । जातकोंका