धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ धनुर्वेदसंहिता इसके उपरान्त पहिले फूल के ऊपर फल रहित बाण से वेध करावे पश्चात् फल सहित बाण से मत्स्य का छेदन करावे, इसके उपरान्त मांस पर निशाना लगवावे, हे विश्वामित्र! इस प्रकार से तीन प्रकार का वेध होता है इन वेधों के करने पर सर्वसाधक बाण हो जाते हैं, अर्थात् सब प्रकार का निशाना आ जाता है और सब वस्तुओं को वेध सकता है॥२४-२५॥ वेधने चैव मांसस्य शरपातो यदा भवेत् । पूर्वदिग्भागमाश्रित्य तदा स्याद्विजयी सुखी ॥२६॥ दक्षिणे कलहो घोरो विदेशगमनं पुनः । पश्चिमे धनधान्यं च सर्वं चैवोत्तरे शुभम् ॥२७॥ ऐशान्यां पवनं दुष्टं विदिशोऽन्याश्च शोभनाः । हर्षपुष्टिकराश्चैव सिद्धिदाः सर्वकर्मणि ॥२८॥ अब वेध का शकुन कहते हैं, यदि मांस का वेध करते समय, वा शमी पूजा में पुतला वेध करते समय वेधन होकर बाण पूर्व दिशा में गिर पड़े तो उस योद्धा की विजय हो और सुख हो, दक्षिण दिशा में गिरे तो बहुत क्लेश हो और परदेश में गमन हो, पश्चिम में बाण गिरे तो धन और धान्य मिले और उत्तर में गिरे तो सब काम उत्तम हों, ईशान में बाण गिरे तो बुरा वायु चले और सारी विदिशा श्रेष्ठ हैं, आनन्द और पुष्टिकी करने वाली और सब कामों में सिद्धि देने वाली हैं॥२६-२८॥ एवं वेधत्रयं कुर्याच्छङ्खदुंदुभिनिस्वनैः । ततः प्रणम्य गुरवे धनुर्बाणान्निवेदयेत् ॥२९॥ ऐसे वेधत्रय करै, शंख और नगारों के शब्द के साथ, पीछे गुरु को प्रमाण करके धनुष और बाण उनके आगे रख दे फिर उनको गुरुदक्षिणा देकर धनुष बाण ले ले॥२९॥ इति धनुर्दानविधिः