भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

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८ धनुर्वेदसंहिता अथ शुभचापलक्षणम् त्रिपर्वं पञ्चपर्वं वा सप्तपर्वं तथा पुनः । नवपर्वं च कोदण्डं सर्वदा शुभकारकम् ॥३५॥ श्रेष्ठ धनुष के लक्षण, तीन पोरी वा पांच पोरी और फिर सात पोरी नव पोरी का धनुष सदा शुभकारक है॥३५॥ चतुष्पर्वं च षट्पर्वमष्टपर्वं विवर्जयेत् ॥३६॥ चार पोरी छः पोरी और आठ पोरियों का धनुष वर्जित है॥३६॥ केषांचिच्च भवेच्चापं वितस्तिनवसंमितम् ॥३७॥ कितने ही के मत में ९ नौ बालिशत का धनुष होता है॥३७॥ अथ वर्जितधनुः अतिजीर्णमपक्वं च ज्ञातिधृष्टं तथैव च । दग्धं छिद्रं न कर्तव्यं बाह्याभ्यन्तरहस्तकम् ॥३८॥ गुणहीनं गुणाक्रान्तं काण्डदोषसमन्वितम् । गलग्रन्थि न कर्तव्यं तलमध्ये तथैव च ॥३९॥ वर्जित धनुष को न धारण करे, बहुत पुराना कच्चा और जो जाति के बाँस का न हो, जला हुआ और छेद वाला बींधा हुआ और जिसके खेंचने से हाथ बाहर चला जाय अथवा भीतर रह जाय, गुणरहित और गुणसे ढका हुआ अर्थात् बहुत मोटी चौड़ी गुणसे ढका हुआ काण्डदोषके साथ अर्थात् अच्छे स्थान में उत्पन्न हुए बांस का न हो जिसके गले में गांठ हो और वैसे ही जिसके तले में गांठ हो ऐसा धनुष वर्जित है॥३८-३९॥ अपक्वं भङ्गमायाति ह्यतिजीर्णं तु कर्कशम् । ज्ञातिधृष्टं तु सोद्वेगं कलहो बांधवैः सह ॥४०॥ दग्धेन दह्यते वेश्म छिद्रं युद्धविनाशनम् । बाह्ये लक्ष्यं न लभ्येत तथैवाभ्यन्तरेपि च ॥४१॥ हीने तु संधिते बाणे संग्रामे भङ्गकारकम् । आक्रान्ते तु पुनः क्वापि लक्ष्यं न प्राप्यते दृढम् ॥४२॥