भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 76 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 29

हिन्दीटीकासमेता २३ पूर्णिमार्द्धदिनं यावन्निषिद्धं सर्वकर्मसु ॥११॥ अब अनध्यायों का वर्णन करते हैं, अष्टमी और अमावस और चौदस ये तिथियां वर्जित हैं, पूर्णमासी आधे दिन तक सब कामों में निषेध की है॥११॥ अकाले गर्जिते देवे दुर्दिनं चाथवा भवेत् । पूर्वकांडहतं लक्ष्यमनध्याये प्रचक्षते ॥१२॥ विना समय बादल गर्जे वा बादलों से छाया हुआ आकाश हो, पहला ही बाण लक्ष्य पर न लगे तो धनुर्वेद विद्या का अनध्याय होता है॥१२॥ अनुराधर्क्षमारभ्य षोडशर्क्षे दिवाकरः । यावच्चरति तं कालमकालं हि प्रचक्षते ॥१३॥ अनुराधा नक्षत्र से आरंभ होकर सोलह नक्षत्रों पर सूर्य जब तक रहे, उस समय को असमय कहते हैं, अर्थात् वृश्चिक के राशि के सूर्य से लेकर मार्गशीर्ष के महीने से ज्येष्ठ तक धनुष का अभ्यास न करे, केवल आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, और आश्विन, कार्तिक इन पांच मासों में ही अभ्यास और पठन पाठन करे॥१३॥ अरुणोदयवेलायां वारिदो यदि गर्जति । तद्दिने स्यादनध्यायस्तमकालं प्रचक्षते ॥१४॥ जिस समय प्रातःकाल लाल बादल हो सूर्य उदय होते समय यदि बादल गर्जे, उस दिन अनध्याय होता है उसको असमय कहते हैं॥१४॥ श्रमं च कुर्वतस्तत्र भुजंगो दृश्यते यदि । अथवा भज्यते चापं यदैव श्रमकर्मणि ॥१५॥ त्रुट्यते वा गुणो यत्र प्रथमे बाणमोक्षणे । श्रमं तत्र न कुर्वीत शस्त्रे मतिमतां वरः ॥१६॥ धनुष अभ्यास करने के आरम्भ में जो सर्प दीखे अथवा धनुष टूट जाय और पहिले ही बाण छोड़ते समय डोरी टूट जाय तो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ धनुर्द्धर को विचार करना चाहिये कि, वह धनुष का वा किसी शस्त्र का भी अभ्यास न करे॥१५-१६॥