भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासमेता ३१ तिरछा बाण न चलावे, किंतु आप तिरछा हो जाय बाण से बाण को जो काट दे, वह बाण छेदी कहाता है॥५३-५४॥ अथ काष्ठच्छेदनम् काष्ठेऽश्वकेशं संयम्य तत्र बध्द्वा वराटिकाम् । हस्तेन भ्राम्यमाणं च यो हन्ति स धनुर्धरः ॥५५॥ लक्ष्यस्थाने न्यसेत्काष्ठं सार्द्रं गोपुच्छसन्निभम् । यश्छिद्यात्तत्क्षुरप्रेण काष्ठच्छेदी स जायते ॥५६॥ अब काष्ठच्छेदन को कहते हैं, लकड़ी को घोड़े का बाल बाँधकर उसमें कौड़ी बांधकर घूमती हुई कौड़ी को जो मार दे वह धनुषधारी है, निशाने की जगह गीली लकड़ी को काली करके रखे, जो उसको क्षुरप्रबाण से छेदन करदे वह सब काष्ठों को काट देगा और (काष्ठच्छेदी) की पदवी मिलेगी॥५५-५६॥ लक्ष्ये बिंदुंन्यसेच्छुभ्रं शुभ्रबंधूकपुष्पवत् । हन्ति तं बिन्दुकं यस्तु चित्रयोधा स उच्यते ॥५७॥ लक्ष्य की जगह सफेद बिंदी शुक्लकुन्दके फूल की सदृश रखे, उस बिन्दु को जो वेध दे वह (चित्रयोधा) कहाता है॥५७॥ काष्ठगोलयुगं क्षिप्रं दूरमूर्ध्वं पुरा स्थितैः । असम्प्राप्तं शरं पृष्ठे तद्गोपुच्छमुखेन हि ॥५८॥ यो हन्ति शरयुग्मेन शीघ्रसंधानयोगतः । स स्याद्धनुर्भृतां श्रेष्ठः पूजितः सर्वपार्थिवैः ॥५९॥ दो काष्ठ के गोलों को शीघ्रता से ऊपर को आकाश में फेंक दे वे दोनों धरती पर गिरने न पावें उनकी पीठ को गोपुच्छमुख से जो वेध दे दो बाणों से शीघ्रसंधान के योग से वह धनुषधारियों में श्रेष्ठ है और सब राजाओं से पूजित है, अर्थात् सब राजाओं को उसका सत्कार करना चाहिये॥५८-५९॥ अथ धावल्लक्ष्यम् रथस्थेन गजस्थेन हयस्थेन च पत्तिना । धावता वै श्रमः कार्यो लक्ष्यं हन्तुं स निश्चितम् ॥६०॥