धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता ३३ पुनः शर्करया तच्च ताडयेच्छब्दहेतवे । पुनर्निश्श्रयतां नेयं शब्दस्थानानुसारतः ॥६७॥ ततः किंचित्कृतं दूरं नित्यं नित्यं विधानतः । लक्ष्यं समभ्यसेद्ध्वाते शब्दवेधनहेतवे ॥६८॥ ततो बाणेन हन्यात्तदवधानेन तीक्ष्णधीः । एतच्च दुष्करं कर्म भाग्ये कस्यापि सिध्यति ॥६९॥ निशाने के स्थान में कांसे का पात्र दो हाथ दूर रखे फिर उसको बालूरेत से ताडन करे, तब शब्द उत्पन्न हो, जहां से शब्द उत्पन्न हो उसको भली भाँति चिंतन करे, कान इन्द्रिय और मन के योग से निशाने को निश्चय करे फिर उसको शब्द सुनने के हेतु शब्दस्थान के अनुसार ताडन करे, जब दो हाथ अंतर से शब्द सुनने का अभ्यास हो जाय। तब कुछ उस कांस्यपात्र को दूर धरे, नित्य बढ़ता जाय, ऐसे शब्दवेधन के लिये निशाने का अभ्यास अँधेरे में करे, फिर बाण से निशाने को सावधान चित्त से हनन करे, यह दुष्कर कर्म किसी के भाग्य में हो उसको सिद्ध होता है॥६५-६९॥ अथ प्रत्यागमनम् खगं बाणन्तु राजेन्द्र प्रक्षिपेद्वायुसम्मुखे । रंजकस्य च नालाभिरतो ह्यागमनं भवेत् ॥७०॥ हे राजेन्द्र विश्वामित्र! खगनाम बाण को वायु के सामने फेंके जिसमें रंजक की नलिका लगी हों, इससे उस बाण का फिर आगमन हो जाता है॥७०॥ अथास्त्रविधिः एवं श्रमविधिं कुर्याद्यावत्सिद्धिः प्रजायते । श्रमे सिद्धे च वर्षासु नैव ग्राह्यं धनुष्करे ॥७१॥ पूर्वाभ्यासस्य शस्त्राणामविस्मरणहेतवे । मासद्वयं श्रमं कुर्यात्प्रतिवर्षं शरद्ऋतौ ॥७२॥