भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

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४० धनुर्वेदसंहिता भूपाहिचोरभीतिघ्नी गृहीता पुष्यभास्करे । सफेद विष्णुकान्ता की जड़ हाथ में रखने से हाथी को दूर कर देती है, सफेद कटहली की जड़ व्याघ्रादिकों के भय को हरती है, पुष्यरविवार को पाढ़र की जड़ उखाड़कर मुख में रखे तो देह नहीं फटे, तीव्र तलवार वा चक्रधारा से, गांधारी के उपार की जड़ मुख में होय तो सन्मुख आये हुए शस्त्रों के समूह को हटा देती है। विधि से उपजी हुई हो, उसको उपवास करके लावे, सफेद झोझुरू की जड़ हो अथवा नीली की जटा को, हाथ शिर मुख में रखने से सब शस्त्रों का निवारण करती है। राजा, चोर, साँप के डर का नाश करती है पुष्यार्क में ग्रहण की हुई हो।।११-१४।। अथ संग्रामविधिः आदौ तु क्रियते मुद्रा पश्चाद्युद्धं समाचरेत् । सर्पमुद्रा कृता येन तस्य सिद्धिर्न संशयः ।।१५।। अब संग्राम करने की विधि लिखते हैं, आदि में शत्रु की सेना के सन्मुख खड़ा होकर मुद्रा करे, पीछे युद्ध का आरम्भ करे, जिसने पहिले सर्पमुद्रा करी हो उसकी सिद्धि हो इसमें संदेह नहीं।।१५।। रुद्रं ध्यात्वा मन्त्रं जपेत् ॐ नमः परमात्मने सर्वशक्तिमते विरूपाक्षाय भालनेत्राय रं हुं फट् स्वाहा । ततो हैमवतीं ध्यात्वा प्रणम्य युद्धमारभेत् ॥ ॐ ह्रीं श्रीं हैमवतीश्वरीं ह्रीं स्वाहा ॥ ॐ ह्रीं वज्रयोगिन्यै स्वाहा । सिंहासनस्थां रुद्राणीं ध्यायेत् ।।१६।। रुद्र का ध्यान करके मंत्र जपे, जो पहिले लिख आये हैं। पीछे हैमवती भगवती का ध्यानकर प्रणामकर युद्ध का आरम्भ करे, हैमवती मंत्र उच्चारण करके, फिर वज्र योगिनी का ध्यान करके सिंह पर चढ़ी हुई रुद्राणी को ध्यावे।।१६।। अपूर्णे शत्रुसामग्री पूर्णे वैश्यबलं तथा । कुरुते पूर्णसत्त्वस्यो जयत्येको वसुंधराम् ।।१७।।