धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता ६३ ब्रह्माजी महादेव का बल पाकर जीतते हैं, विष्णु चन्द्रमा के बल में जीतते हैं और रुद्रजी सूर्य का बल पाकर जीतते हैं, चन्द्रमा ब्रह्मा के बल से युद्ध में जीतते हैं, सूर्यनारायण विष्णु के बल को पाकर जीतते हैं, इसमें संदेह नहीं॥६४॥ अ ब्रह्मा विष्णुरी रुद्र उश्चन्द्रस्त्वे च भास्करः । ओ ज्ञेयःपार्थिवैर्नित्यं जन्यशास्त्रविचक्षणैः ॥६५॥ (अ) ब्रह्मा (इ) विष्णु (उ) रुद्र (ए) चन्द्र (ओ) सूर्य, युद्धशास्त्र के चतुर राजाओं ने जानना॥६५॥ प्राप्य स्वं स्वं बलं सेनाः पूर्वोक्ता युद्धगा यदि । क्षणाधन अरीन्सर्वान्मारयंतीति रुद्रवाक् ॥६६॥ पहिले कही हुई सेना यदि अपना अपना बल पाकर युद्ध को जाय तो आधी आधी क्षण में सब शत्रुओं को मारें यह महादेवजी की वाणी है॥६६॥ इति पदातिक्रमः अथाश्वक्रमः मण्डलं चतुरस्रं च गोमूत्रं चार्द्धचन्द्रकम् । नागपाशक्रमेणैव भ्रामयेत्कटपंचकम् ॥६७॥ गोलाकार-चौकोर-गोमूत्राकार-अर्धचन्द्राकार और नागपाश क्रम से घोड़े की कवायद कराने से वह फिर कहीं नहीं अटकता भ्रमावे॥ गोल चौकार गोमूत्राकार