धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॐ साम्बसदाशिवाय नमः अथ वासिष्ठीधनुर्वेदसंहिताप्रारम्भः अथैकदा विजिगीषुुर्विश्वामित्रो राजर्षिर्गुरुं वसिष्ठमभ्यु- पेत्य प्रणम्योवाच ब्रूहि भगवन् धनुर्विद्यां श्रोत्रियाय दृढचेतसे शिष्याय दुष्टशत्रुविनाशाय च । तमुवाच महर्षिर्ब्रह्मर्षिप्रवरो वसिष्ठः शृणु भो राजन्विश्वामित्र यां सरहस्यधनुर्विद्यां भगवान्सदाशिवः परशुरामायो- वाच तामेव सरहस्यां वच्मि ते हिताय गोब्राह्मणसाधु- वेदरक्षणाय च यजुर्वेदाथर्वसम्मितां संहिताम् ॥ एक समय विजय के आकांक्षी राजर्षि विश्वामित्र वसिष्ठ गुरुजी के पास जाकर प्रणाम कर बोले, हे भगवन्! श्रोत्रिय, दृढ़चित्त, मुझशिष्य को दुष्ट स्वभाव वाले शत्रुओं का नाश करने के लिए धनुर्विद्या कहिए। महर्षिब्रह्मऋषियों में श्रेष्ठ वसिष्ठजी बोले कि हे राजन् विश्वामित्र! सुनिए, जिस सरहस्य धनुर्वेदविद्या को भगवान् महादेवजी ने परशुराम- जी को कहा था। उसी यजुर्वेद और अथर्ववेद से मिली हुई रहस्य सहित धनुर्विद्या को मैं आपसे गौ, ब्राह्मण, वेद और साधुओं की रक्षा के लिये कहता हूँ॥ अथोवाच महादेवो भार्गवाय च धीमते । तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि याथातथ्येन संशृणु ॥१॥ महादेवजी ने बुद्धिमान् परशुरामजी से जो कहा था। ठीक वही मैं आपसे कहता हूँ, सुनिये॥१॥ २