धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता ३ अथ धनुर्दानविधिः आचार्येण धनुर्देयं ब्राह्मणे सुपरीक्षिते । लुब्धे धूर्ते कृतघ्ने च मन्दबुद्धौ न दापयेत् ॥७॥ धनुर्विद्या देने की विधि यह है कि, आचार्य को चाहिये कि अच्छी परीक्षा किये हुए ब्राह्मण को धनुर्विद्या दें। लोभी और धूर्त, जो दी हुई विद्या का अहसान न माने ऐसे पुरुष को तथा मन्दबुद्धि को धनुर्विद्या न दे॥७॥ ब्राह्मणाय धनुर्देयं खड्गं वै क्षत्त्रियाय च । वैश्याय दापयेत्कुन्तं गदां शूद्राय दापयेत् ॥८॥ ब्राह्मण को धनुष दे, क्षत्रिय को तलवार, वैश्य को भाला और शूद्र को गदायुद्ध सिखावे॥८॥ धनुश्चक्रं च कुन्तं च खड्गं च क्षुरिका गदा । सप्तमं बाहुयुद्धं स्यादेवं युद्धानि सप्तधा ॥९॥ धनुष १ चक्र २ भाला ३ खड्ग ४ छुरी ५ गदा ६ सातवां हाथों से मल्ल युद्ध इस प्रकार से सात प्रकार का युद्ध है॥९॥ अथाचार्यलक्षणम् आचार्यः सप्तयुद्धः स्याच्चतुर्भिर्भार्गवः स्मृतः । द्वाभ्यां चैव भवेद्योद्धा एकेन गणको भवेत् ॥१०॥ अब आचार्य के लक्षण कहते हैं। जो सातों प्रकारके युद्ध जानता है वह आचार्य होता है। जो चार प्रकारके युद्ध जाने, वह भार्गव कहलाता है। दो प्रकारके युद्ध को जानने वाला योद्धा होता है, और एक प्रकारके युद्ध से गणकसंज्ञा वाला होता है॥१०॥ हस्तः पुनर्वसुः पुष्यो रोहिणी चोत्तरात्रयम् । अनुराधाश्विनी चैव रेवती दशमी तथा ॥११॥ धनुर्विद्या का मुहूर्त हस्त, पुनर्वसु, पुष्य, रोहिणी, और तीनों उत्तरा, अनुराधा, अश्विनी और दशवीं रेवती॥११॥ जन्मस्थे च तृतीये च षष्ठे वै सप्तमे तथा । दशमैकादशे चन्द्रे सर्वकार्याणि कारयेत् ॥१२॥