भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 680 में से

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पृष्ठ 109

तत्त्वं चार्थः । यत्तदिति सर्वनामसमुदायश्चमत्कारसारताप्रकटीकरणार्थमव्य- पदेश्यत्वमन्योन्यसंवलनाकृतं चाव्यतिरेकभ्रमं दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोर्दर्शयति । एतच्च किमपीत्यादिना व्याचष्टे । लावण्यं हि नामावयवसंस्थानाभिव्यङ्ग्यमव- यवव्यतिरिक्तं धर्मान्तरमेव । न चावयवानामेव निर्दोषता वा भूषणयोगो वा लावण्यम्, पृथङ्निर्वर्ण्यमानकाणादिदोषशून्यशरीरावयवयोगिन्यामप्यलङ्कृ- तायामपि लावण्यशून्येयमिति, अतथाभूतायामपि कस्याञ्चिल्लावण्यामृत- चन्द्रिकेयमिति सहृदयानां व्यवहारात् । ननु लावण्यं तावद् व्यतिरिक्तं प्रथितम् । प्रतीयमानं किं तदित्येव न जानीमः, दूरे तु व्यतिरेकप्रथेति । तथा भासमानत्वमसिद्धो हेतुरित्याशङ्क्य स ह्यर्थे इत्यादिना स्वरूपं तस्याभिधत्ते । सर्वेषु चेत्यादिना च व्यतिरेकप्रथां सर्वनामों का ( प्रतीयमान अर्थ का ) चमत्कार का सार होना प्रकट करने के लिए व्यपदेश ( नामकरण ) की अशक्यता एवं परस्पर मिश्रण से उत्पन्न ( वाच्य और व्यङ्ग्य तथा अङ्गना का अङ्ग और लावण्य ) दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में अव्यतिरेक ( अभेद ) का भ्रम दिखाता है । और इसे 'कुछ' इत्यादि द्वारा व्याख्यान करते हैं । 'लावण्य'१ तो वह धर्म-विशेष ही है जो अवयवों के संघटन ( संस्थान ) से अभिव्यक्त होकर अवयवों से व्यतिरिक्त ( पृथक् ) रहता है । अवयवों की निर्दोषता ही अथवा उनका भूषणों से संयोग 'लावण्य' नहीं है, क्योंकि जो पृथक् दिखाई देते हुए काणत्व आदि दोषों से शून्य स्त्री में सहृदय लोगों का व्यवहार 'यह लावण्यशून्य है' यह होता है और जो उस प्रकार की नहीं है उस किसी स्त्री में ( उनका यह व्यवहार होता है कि ) यह लावण्यरूपी अमृत की चन्द्रिका है । लावण्य तो ( अङ्गों से ) व्यतिरिक्त रूप में प्रसिद्ध है, ( किन्तु ) वह प्रतीयमान क्या है, यही नहीं जानते, व्यतिरेक ( भेद ) की स्थिति तो दूर रहे ! उस प्रकार भासमानत्व रूप हेतु असिद्ध२ है, यह आशङ्का करके 'वह अर्थ' इत्यादि द्वारा उस ( प्रतीयमान ) अर्थ का स्वरूप कहते हैं । 'और सब उनके प्रकारों में' इत्यादि द्वारा


१. 'लावण्य' के सम्बन्ध में यह प्रसिद्ध श्लोक यहाँ स्मरणीय है— मुक्ताफलेषु च्छायायास्तरळत्वमिवान्तरा । प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमिहोच्यते ॥ अर्थात् मुक्ताओं में जो छाया की तरलता की भाँति अङ्गों में कुछ झलकता या दिपता हुआ मालूम पड़ता है वह 'लावण्य' कहलाता है। २. ऊपर प्रतीयमान अर्थ की सिद्धि के लिए 'भासमानत्व' को 'हेतु' दिया गया है, अर्थात् प्रतीयमान अर्थ इसलिए है क्योंकि वह भासित होता है, किन्तु हम यदि यहाँ यह कहें कि यह हेतु 'असिद्ध' है, अर्थात् प्रतीयमान अर्थ की सिद्धि इससे नहीं होगी ऐसी स्थिति में क्या समाधान है ? न्याय-शास्त्र में 'हेतु' के पाँच दोष बताये गये हैं जिनमें 'असिद्धि' भी एक दोष है । पाँच दोषों में किसी एक की भी हेतु में शङ्का मात्र के हो जाने पर उस 'हेतु' से साध्य का निर्णय नहीं किया जा सकता । ४ ध्व०