भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 680 में से

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पृष्ठ 129

प्रथम उद्योतः ६९ लोचनम् ध्वननव्यापारः किं न सह्यते । किं च वस्तुध्वनिं दूषयता रसध्वनिस्तदनुग्रा- हकः समर्थ्यत इति सुष्ठुतरां ध्वनिध्वंसोऽयम् । यदाह—'क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः' इति । अथ रसस्यैवेयता प्राधान्यमुक्तम्; तत्को न सहते । अथ वस्तुमात्रध्वनेरेतदुदाहरणं न युक्तमित्युच्यते, तथापि काव्योदाहरणत्वाद् द्वाव- प्यत्र ध्वनी स्तः, को दोषः । यदि तु रसानुवेधेन विना न तुष्यति, तद् भयानकरसानुवेधो नात्र सहृद- यहृदयदर्पणमध्यास्ते; अपि तु उक्तनीत्या सम्भोगाभिलाषविभावसङ्केतस्था- नोचितविशिष्टकाकाद्यनुभावशबलनोदितशृङ्गाररसानुवेधः । रसस्यालौकिकत्वा- प्रतिपत्ता की प्रतिभा से प्राणित ध्वननव्यापार को क्यों नहीं सहन करते ? दूसरे यह कि वस्तुध्वनि को तो दूषित करते हैं, रसध्वनि का, 'जो उस (वस्तुध्वनि) का अनुग्राहक है, समर्थन करते हैं, तो खूब यह ध्वनि का ध्वंस है ! जो कि कहा है— 'देवता का क्रोध भी वर के जैसा होता है।' यदि कहिए कि अब तक रस का ही प्राधान्य कहा है, तो इस बात को कौन नहीं सहन करता है ? यदि वस्तुमात्र ध्वनि का यह उदाहरण ठीक नहीं है, ऐसा कहते हैं तथापि काव्य के उदाहरण होने से दोनों ध्वनि यहाँ हैं तो क्या दोष है ? यदि (सहृदय) विना रसानुवेध (रसावेश) के सन्तुष्ट नहीं होता है, तो (कहना यह है कि) सहृदय के हृदय-दर्पण में भयानक रस का आवेश अधिष्ठित नहीं होता, बल्कि उक्त प्रकार से सम्भोग की अभिलाषा का उद्दीपन-विभाव जो सङ्केत-स्थान है उसके उचित जो विशिष्ट काकु आदि अनुभाव हैं, उनके शबलन (सम्मिश्रण) से शृङ्गाररस का अनुवेध (आवेश) उदित होता है। रस के अलौकिक होने से और उतने मात्र से ही उसका अवगम सम्भव नहीं है, अतएव प्रथम जिनका भेद निर्विवाद समान 'भीरु' नहीं होता है, बल्कि वीरप्रकृति भी होता है। इस पर भट्टनायक के पक्ष का यह कथन है कि यदि प्रतिपत्ता के प्रतिभाविशेष अर्थात् भीरुत्व को यहाँ भयानकरस के आवेश के होने में सहकारी कारण कल्पित कर लिया जाय तो नियम बन सकता है और उस तरह का प्रत्येक प्रतिपत्ता भयानकरस के आवेश से 'निषेध' का ज्ञान कर सकता है। इस पर लोचनकार का कहना है कि जब आपने प्रतिपत्ता के प्रतिभाविशेष तक को स्वीकार कर लिया तब ध्वननव्यापार को क्यों नहीं सह लेते हैं, क्योंकि ध्वनन में भी तो प्रतिपत्ता का प्रतिभाविशेष सहकारी होता है ? आश्चर्य तो इस पर होता है कि वस्तुध्वनि को स्वीकार नहीं करते और रसध्वनि को स्वीकार करते हैं, जब कि सध्वनि वस्तुध्वनि का अनुग्राहक है। यदि आप इस पर अड़े हुए हैं कि यहाँ रसध्वनि का प्राधान्य है तो हम आपकी बात को अमान्य नहीं ठहराते। हमें तो बस यही कहना है कि किसी प्रकार 'ध्वनि' का निराकरण नहीं होना चाहिए। प्रस्तुत में यदि रसध्वनि और वस्तुध्वनि दोनों हों, तो क्या हर्ज है !